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द्यु॒म्नी वां॒ स्तोमो॑ अश्विना॒ क्रिवि॒र्न सेक॒ आ ग॑तम् । मध्व॑: सु॒तस्य॒ स दि॒वि प्रि॒यो न॑रा पा॒तं गौ॒रावि॒वेरि॑णे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

dyumnī vāṁ stomo aśvinā krivir na seka ā gatam | madhvaḥ sutasya sa divi priyo narā pātaṁ gaurāv iveriṇe ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

द्यु॒म्नी । वा॒म् । स्तोमः॑ । अ॒श्वि॒ना॒ । क्रिविः॑ । न । सेके॑ । आ । ग॒त॒म् । मध्वः॑ । सु॒तस्य॑ । सः । दि॒वि । प्रि॒यः । न॒रा॒ । पा॒तम् । गौ॒रौऽइ॑व । इरि॑णे ॥ ८.८७.१

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:87» मन्त्र:1 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:10» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:9» मन्त्र:1


हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दिवि प्रियः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अश्विना) = प्राणापानो! (वाम्) = आपका (स्तोमः) = स्तवन (द्युम्नी) = हमारी ज्ञान ज्योति को बढ़ानेवाला है। आपका यह स्तवन (सेके) = उदक के सेचन के होने पर (क्रिविः न) = कूएँ के समान है । वृष्टि द्वारा जलसेचन होने पर कूआँ अल्प उदकवाला नहीं होता। इसी प्रकार प्राणापान का स्तवन हमें अल्पज्ञानवाला नहीं रखता। प्राणसाधना से ज्ञान खूब ही दीप्त हो उठता है । सो हे प्राणपानो! (आगतम्) = आप आओ। [२] हे (नरः) = हमें आगे ले चलनेवाले प्राणापानो! (सुतस्य) = उत्पन्न हुए - हुए (मध्वः) = जीवन को मधुर बनानेवाले सोम का (पातम्) = पान करो। इस प्रकार से पान करो, (इव) = जैसे (इरिणे) = [ a riverlet] एक छोटी नदी पर (गौरौ) = दो गौर मृग पानी पीते हैं। हे प्राणापानो! जिसके शरीर में आप उत्पन्न हुए इस सोम का रक्षण करते हो (सः) = वह (दिवि प्रियः) = ज्ञान में प्रीतिवाला होता है। सुरक्षित सोम इसकी बुद्धि को सूक्ष्म बनाता है। यह अपनी सूक्ष्म बुद्धि से गम्भीर विषयों को भी समझनेवाला बनता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणसाधना के होने पर ज्ञानदीप्ति की वृद्धि होती है। प्राणापान सोम का शरीर में पान करते हुए बुद्धि को सूक्ष्म बनाते हैं। यह सूक्ष्म बुद्धि पुरुष ज्ञानप्रिय बनता है।

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Splendid is your song of praise, Ashvins, come like the soothing sprinkle of a fountain, both of you, and drink of the honey sweets of soma, delightful as distilled in the light of heaven. Come, best of men, leaders of life, and drink like thirsty stags at a pool in the desert.