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उ॒त्तिष्ठ॒न्नोज॑सा स॒ह पी॒त्वी शिप्रे॑ अवेपयः । सोम॑मिन्द्र च॒मू सु॒तम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

uttiṣṭhann ojasā saha pītvī śipre avepayaḥ | somam indra camū sutam ||

पद पाठ

उ॒त्ऽतिष्ठ॑न् । ओज॑सा । स॒ह । पी॒त्वी । शिप्रे॒ इति॑ । अ॒वे॒प॒यः॒ । सोम॑म् । इ॒न्द्र॒ । च॒मू इति॑ । सु॒तम् ॥ ८.७६.१०

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:76» मन्त्र:10 | अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:28» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:8» मन्त्र:10


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शिव शंकर शर्मा

परमात्मा की स्तुति करते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (मीढ्वः) हे आनन्द की वर्षा देनेवाले (शतक्रतो) अनन्तकर्मन् (पुरुष्टुत) हे बहुस्तुत (इन्द्र) हे महेन्द्र ! (अस्मिन्+यज्ञे) इस सृजन पालन संहरण दयादर्शन आदि क्रिया के निमित्त (सोमं+पिब) इस संसार की रक्षा कर अथवा समस्त पदार्थों को कृपादृष्टि से देख, जिस हेतु तू (मरुत्वान्) प्राणों का सखा है ॥७॥
भावार्थभाषाः - इस जगत् में सृजन, पालन, दया, रक्षा परस्पर साहाय्य और संहार आदि व्यापार हो रहे हैं, वे सब ही ईश्वरीय यज्ञ हैं। इसको हे मनुष्यों ! तुम भी पूर्ण करो ॥७॥
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शिव शंकर शर्मा

परमात्मा स्तूयते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे मीढ्वः=आनन्दसेक्तः ! हे शतक्रतो=अनन्तकर्मन् ! हे पुरुस्तुत=बहुजनस्तुत ! हे इन्द्र=ईश ! अस्मिन् यज्ञे=पालनादिकार्य्ये। मरुत्वाँस्त्वम्। सोमं+पिब=संसारं रक्ष। पा रक्षणे यद्वा कृपया अवलोकय ॥७॥