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चर॑न्व॒त्सो रुश॑न्नि॒ह नि॑दा॒तारं॒ न वि॑न्दते । वेति॒ स्तोत॑व अ॒म्ब्य॑म् ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
caran vatso ruśann iha nidātāraṁ na vindate | veti stotava ambyam ||
पद पाठ
चर॑न् । व॒त्सः । रुश॑न् । इ॒ह । नि॒ऽदा॒तार॑म् । न । वि॒न्द॒ते॒ । वेति॑ । स्तोत॑व्र् । अ॒म्ब्य॑म् ॥ ८.७२.५
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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:72» मन्त्र:5
| अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:14» मन्त्र:5
| मण्डल:8» अनुवाक:8» मन्त्र:5
शिव शंकर शर्मा
होतृकार्य दिखलाते हैं।
पदार्थान्वयभाषाः - (होता) होता नाम के ऋत्विक् (अस्य+सख्यम्) ईश्वर की मित्रता प्रार्थना और यज्ञसम्बन्धी अन्यान्य व्यापार (जुषाणः) करते हुए (मनौ+अधि) जहाँ सब बैठे हों, उससे उच्च आसन पर (तिग्मम्+अंशुम्) तीव्र अंशु अर्थात् अग्निकुण्ड के (अभि) अभिमुख होकर (निषीदत्) बैठे ॥२॥
भावार्थभाषाः - होता कुछ उच्च आसन पर बैठ ईश्वर का ध्यान करे ॥२॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
चरन्, वत्सः, रुशन्
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (चरन्) = खूब गतिशील होता हुआ (वत्सः) = प्रभु के नामों का उच्चारण करनेवाला [ वदति] (इह) = इस जीवन में (रुशन्) = ज्ञान से चमकता हुआ होता है-शुभ्र जीवनवाला होता है। यह (निदातारं) = [दाप् लवने] काटनेवाली वासनाओं को (न विन्दते) = नहीं प्राप्त करता है। इसे वासनाएँ विदीर्ण नहीं कर पातीं। [२] यह वत्स (स्तोतवे) = स्तुति के लिए (अम्ब्यम्) = ' ज्ञान, कर्म व उपासना' की त्रिविध वाणियों का उच्चारण करनेवाले प्रभु को (वेति) = [कामयते] चाहता है। प्रभु का स्तवन ही तो इसे वासनाओं से विदीर्ण नहीं होने देता।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - शरीर में 'चरन्', मन या वाणी में 'वत्स', मस्तिष्क में 'रुशन्' बनते हुए हम प्रभु के स्तवन की ही कामना करें। ऐसा होने पर हमें वासनाएँ विदीर्ण न कर पाएँगी।
शिव शंकर शर्मा
होतृकार्य्यं दर्शयति।
पदार्थान्वयभाषाः - होता। अस्येश्वरस्य। सख्यं+जुषाणः=सेवमानः सन्। मनौ+अधि=मनुष्याणामुपरि स्थाने आसने। तिग्मम्। अंशुम्=अग्निमभि। निसीदत्=उपविशतु ॥२॥
डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Agni, newly risen, playing as hyperactive and shining bright, brooks no obstruction and for its description and assessment needs a celebrant appraiser.
