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सोम॑स्य मित्रावरु॒णोदि॑ता॒ सूर॒ आ द॑दे । तदातु॑रस्य भेष॒जम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

somasya mitrāvaruṇoditā sūra ā dade | tad āturasya bheṣajam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सोम॑स्य । मि॒त्रा॒व॒रु॒णा॒ । उत्ऽइ॑ता । सूरे॑ । आ । द॒दे॒ । तत् । आतु॑रस्य । भे॒ष॒जम् ॥ ८.७२.१७

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:72» मन्त्र:17 | अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:17» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:8» मन्त्र:17


हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सोम का आदान- आतुर का भेषज

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (मित्रावरुणा) = स्नेह व निर्देषता के दिव्यभावो ! (सूरे उदिता) = सूर्य के उदय के निमित्त यह उपासक (सोमस्य आददे) = सोम का आदान करता है। शरीर में सोमशक्ति का रक्षण ही ज्ञान के सूर्य का उदय करता है। यह सोम ही तो ज्ञानाग्नि का ईंधन बनता है। [२] (तद्) = यह सोम का पान ही (आतुरस्य भेषजम्) = रोगी की औषध है । सोमरक्षण द्वारा ही सब रोगों की चिकित्सा होती है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- स्नेह व निर्देषता के भाव हमें सोमरक्षण के योग्य बनाते हैं। इस सोमरक्षण से मस्तिष्करूप द्युलोक में ज्ञान के सूर्य का उदय होता है तथा शरीरस्थ सब रोग विनष्ट होते हैं।

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Mitra, O Varuna, O lord of love and justice, may I, at the rise of the sun, receive the heavenly light and joy of soma, rejuvenating nectar of life for the supplicant yearning for fulfilment.