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उप॒ स्रक्वे॑षु॒ बप्स॑तः कृण्व॒ते ध॒रुणं॑ दि॒वि । इन्द्रे॑ अ॒ग्ना नम॒: स्व॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

upa srakveṣu bapsataḥ kṛṇvate dharuṇaṁ divi | indre agnā namaḥ svaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उप॑ । स्रक्वे॑षु । बप्स॑तः । कृ॒ण्व॒ते । ध॒रुण॑म् । दि॒वि । इन्द्रे॑ । अ॒ग्ना । नमः॑ । स्वः॑ ॥ ८.७२.१५

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:72» मन्त्र:15 | अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:16» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:8» मन्त्र:15


हरिशरण सिद्धान्तालंकार

इन्द्रे, अग्नौ

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (स्रक्वेषु) = [सृज् - निर्माण] शरीरावयवों के निर्माणों के निमित्त अर्थात् शरीर की कमी को दूर करने के लिए (उपबप्सतः) = प्रभु के उपासन के साथ भोजन करते हुए ये उपासक (दिवि) = प्रकाश में (धरुणं) = अपने को धारण (कृण्वते) = करते हैं। सदा ज्ञानप्रधान जीवन बिताने का प्रयत्न करते हैं। [२] (इन्द्रे) = उस सर्वशक्तिसम्पन्न प्रभु में तथा (अग्ना) = प्रकाशमय प्रभु में (नमः) = ये नमन वाले होते हैं तथा (स्वः) = प्रकाश को प्राप्त करते हैं। प्रभुनमन इनके हृदयों को पवित्र व वासनाशून्य बनाता है और परिणामतः ये सबल होते है। इस प्रभुनमन के द्वारा ही ये अन्तर्ज्ञान की ज्योति को प्राप्त करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम शरीरधारण के लिए ही भोजन करें-सदा प्रकाश में निवास करें। सर्वशक्तिमान् प्रभु के प्रति नमन करते हुए प्रकाशमय जीवन बिताएँ ।

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, receiving, kindling and consuming the oblations in the flames, turns the havi into light in heaven as offering in the cup of faith to Indra. (So does the yogi turn his thoughts through contemplation into light and joy in the higher personality to offer it as homage to Indra.)