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गाव॒ उपा॑वताव॒तं म॒ही य॒ज्ञस्य॑ र॒प्सुदा॑ । उ॒भा कर्णा॑ हिर॒ण्यया॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

gāva upāvatāvatam mahī yajñasya rapsudā | ubhā karṇā hiraṇyayā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

गावः॑ । उप॑ । अ॒व॒त॒ । अ॒व॒तम् । म॒ही इति॑ । य॒ज्ञस्य॑ । र॒प्सुदा॑ । उ॒भा । कर्णा॑ । हि॒र॒ण्यया॑ ॥ ८.७२.१२

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:72» मन्त्र:12 | अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:16» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:8» मन्त्र:12


हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मही यज्ञस्य रप्सुदा

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (गावः) = वेदवाणीरूप गौओ ! (अवतं) = इस आत्मा के निवासस्थानभूत और अतएव रक्षणीय शरीर का (उपावत) = समीपता से रक्षण करो। हमें इन वेदवाणियों का सदा सान्निध्य प्राप्त हो और हम इनके अनुसार जीवन को बनाते हुए इस शरीर का रक्षण कर पाएँ। [२] (मही) = यह पृथिवी यज्ञस्य यज्ञ के (रप्सु-दा) = प्रारम्भ करने की कामनावाले के लिए फल को देनेवाली है। हम यज्ञशील बनें और हमारे लिए यह पृथिवी सब उत्कृष्ट कामों का काम्य पदार्थों का दोहन करनेवाली होगी। [३] (उभा कर्णा हिरण्यया) = हमारे दोनों कान ज्योतिर्मय बनें। वेदवाणियों को सुनते हुए वे प्रकाश से परिपूर्ण हों। [४] निरुक्त २.११ के अनुसार 'मही' का अर्थ गौ है। यह वेदवाणीरूप गौ (यज्ञस्य) = यज्ञ का (रप्-सु-दा) = मन्त्रशब्दों के द्वारा सम्यक् उपदेश देनेवाली हैं। इस उपदेश से ही हमारे दोनों कान ज्योतिर्मय बनते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-वेदवाणीरूप गौएँ हमारे शरीर का रक्षण करती हैं। यह वेदवाणी यज्ञों का उत्तम उपदेश देती हुई हमारे कानों को ज्योतिर्मय बनाती हैं।

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The psychic base of the devoted seeker of meditative communion is highly creative. O mind and senses attended with both knowledge and action of divine character, rise high and reach close to the reservoir of divine grace and win the showers of bliss.