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उ॒रु॒ष्या णो॒ मा परा॑ दा अघाय॒ते जा॑तवेदः । दु॒रा॒ध्ये॒३॒॑ मर्ता॑य ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
uruṣyā ṇo mā parā dā aghāyate jātavedaḥ | durādhye martāya ||
पद पाठ
उ॒रु॒ष्य । नः॒ । मा । परा॑ । दाः॒ । अ॒घ॒ऽय॒ते । ज॒त॒ऽवे॒दः॒ । दुः॒ऽआ॒ध्ये॑ । मर्ता॑य ॥ ८.७१.७
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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:71» मन्त्र:7
| अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:12» मन्त्र:2
| मण्डल:8» अनुवाक:8» मन्त्र:7
शिव शंकर शर्मा
उसका महत्त्व दिखलाते हैं।
पदार्थान्वयभाषाः - हे अग्ने ! तू (यं+दाश्वांसम्) जिस दाता और उदार पुरुष का (त्रायसे) साहाय्य और रक्षा करता है, (तम्+मर्तम्) उस मर्त्य को (अरातयः) शत्रु और दुष्ट (रायः) कल्याणसम्पत्ति से (न+युवन्त) कोई भी पृथक् नहीं कर सकता ॥४॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा की कृपा जिस पर होती है, उसको कौन शक्ति कल्याण-मार्ग से पृथक् कर सकती है ॥४॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
'अघायते दुराध्ये' मा परादाः
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (जातवेदः) = सर्वज्ञ व सर्वधन प्रभो! आप (नः) = हमें (उरुष्य) = रक्षित करिये। [२] आप हमें (अघायते) = पाप की इच्छावाले (दुराध्ये) = दुष्ट ध्यानवाले-दुर्विचिन्तक मर्ताय पुरुष के लिए (मा परादाः) = मत दे डालिये। ऐसे पुरुषों के वश में हमें न करिये।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु की उपासना से इस जीवन संग्राम में हम दुष्ट विचारों से बचें तथा दुष्ट विचारवालों के वशीभूत भी न हो जायें।
शिव शंकर शर्मा
तन्महत्त्वं दर्शयति।
पदार्थान्वयभाषाः - हे अग्ने ! अरातयः=शत्रवः। तं+मर्तं=मर्त्यम्। रायः=कल्याणधनात्। न+युवन्त=न पृथक् कर्तुं शक्नुवन्ति। यं+दाश्वांसं=दातारम्। त्वं त्रायसे ॥४॥
डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - All pervasive, omniscient Agni, protect us and leave us not to the sinner, the criminal, and the man of evil thought and action.
