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न तम॑ग्ने॒ अरा॑तयो॒ मर्तं॑ युवन्त रा॒यः । यं त्राय॑से दा॒श्वांस॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

na tam agne arātayo martaṁ yuvanta rāyaḥ | yaṁ trāyase dāśvāṁsam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

न । तम् । अ॒ग्ने॒ । अरा॑तयः । मर्त॑म् । यु॒व॒न्त॒ । रा॒यः । यम् । त्राय॑से । दा॒श्वांस॑म् ॥ ८.७१.४

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:71» मन्त्र:4 | अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:11» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:8» मन्त्र:4


शिव शंकर शर्मा

इस सूक्त में अग्नि नाम से परमात्मा की स्तुति की जाती है।

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे सर्वाधार हे सर्वशक्ते जगन्नियन्ता ईश ! (त्वम्) तू (महोभिः) स्वकीया महती शक्तियों के द्वारा (विश्वस्याः) समस्त (अरातेः) शत्रुता दीनता और मानसिक मलीनता आदि से (नः) हमको (पाहि) बचा (उत) और (मर्त्यस्य) मनुष्य के द्वेष, ईर्ष्या और द्रोह आदिकों से भी हमको बचा ॥१॥
भावार्थभाषाः - इससे यह शिक्षा देते हैं कि तुम प्रथम निष्कारण शत्रुता न करो। केवल मनुष्यता क्या है, इस पर पूर्ण विचार कर इसका प्रचार करो। अपने अन्तःकरण से सर्वथा हिंसाभाव निकाल दो ॥१॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अरातयः रायो न युवन्त

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अग्ने) = परमात्मन् ! (तं मर्तम्) = उस मनुष्य को (अरातयः) = शत्रु (रायः) = धन से (न युवन्त) = पृथक् नहीं कर पाते, (यं) = जिस (दाश्वांसम्) = दानशील को आप (त्रायसे) = रक्षित करते हैं। [२] हम दाश्वान् बने। दानशील पुरुष सदा प्रभु का प्रिय होता है, क्योंकि यह धन के प्रति आसक्तिवाला नहीं होता। हम प्रभु के प्रिय होंगे तो कोई भी हमें धनों से पृथक् न कर पाएगा।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- दानशील व्यक्ति प्रभु से रक्षण को प्राप्त करता है। इसे कोई भी ऐश्वर्य से पृथक् करनेवाला नहीं होता ।

शिव शंकर शर्मा

अस्मिन् सूक्तेऽग्निनाम्ना परमात्मा स्तूयते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे अग्ने=सर्वाधार ! सर्वशक्ते ! त्वं+महोभिः=महतीभिः शक्तिभिः। नोऽस्मान्। विश्वस्याः=सर्वस्याः। अरातेः=शत्रुताया दीनताया मानसिकमलीनताप्रभृतिभ्यः। पाहि। उत+मर्त्यस्य। द्विषः=द्वेषाद् इर्ष्याया द्रोहादिभ्यश्चास्मान् पाहि ॥१॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - No adversities, no enemies, can deprive that generous man of his wealth, honour and excellence whom you protect and promote.