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अ॒ग्निं द्वेषो॒ योत॒वै नो॑ गृणीमस्य॒ग्निं शं योश्च॒ दात॑वे । विश्वा॑सु वि॒क्ष्व॑वि॒तेव॒ हव्यो॒ भुव॒द्वस्तु॑ॠषू॒णाम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

agniṁ dveṣo yotavai no gṛṇīmasy agniṁ śaṁ yoś ca dātave | viśvāsu vikṣv aviteva havyo bhuvad vastur ṛṣūṇām ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒ग्निम् । द्वेषः॑ । योत॒वै । नः॒ । गृ॒णी॒म॒सि॒ । अ॒ग्निम् । शम् । योः । च॒ । दात॑वे । विश्वा॑सु । वि॒क्षु । अ॒वि॒ताऽइ॑व । हव्यः॑ । भुव॑त् । वस्तुः॑ । ऋ॒षू॒णाम् ॥ ८.७१.१५

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:71» मन्त्र:15 | अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:13» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:8» मन्त्र:15


शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यों ! (वः) आप लोग (देवयज्यया) देवयजनार्थ (अग्निम्) उस परमदेव की स्तुति कीजिये, (अध्वरे+प्रयति) यज्ञ के समय में भी (अग्निम्) उस परमात्मा का गान कीजिये, (धीषु) निखिल शुभकर्मों में या बुद्धि के निमित्त (प्रथमम्+अग्निम्) प्रथम अग्नि को ही स्मरण कीजिये, (अर्वति) यात्रा के समय (अग्निम्) ईश्वर का ही स्मरण कीजिये, (क्षैत्राय+साधसे) क्षेत्र के साधनों के लिये (अग्निम्) उसी ईश से माँगिये ॥१२॥
भावार्थभाषाः - सब वस्तु की प्राप्ति के लिये सब काल में उसी की स्तुति प्रार्थना करनी चाहिये ॥१२॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वस्तुः ऋषूणाम्

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अग्निं) = उस परमात्मा को (गृणीमसि) = हम स्तुत करते हैं, जिससे (नः द्वेषः योतवै) = हमारे से द्वेष की भावनाओं को वे दूर करें। (अग्निं) = उस परमात्मा को हम (शं) = शान्ति (च) = तथा (योः) = भयों के यावन को देने के लिए पुकारते हैं। [२] वे प्रभु (विश्वासु विक्षु) सब प्रजाओं में (अविता इव) = रक्षक के समान (हव्यः भुवत्) = पुकारने योग्य होते हैं। वे प्रभु (ऋषूणाम्) = तत्त्वद्रष्टा पुरुषों के (वस्तुः) = उत्तम निवास का कारण होते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ:- प्रभु का उपासन हमें 'निर्देष- शान्त व निर्भय' बनाता है। प्रभु हमारे रक्षक हैं, तत्त्वद्रष्टाओं के वस्तु [निवासक] हैं। गतमन्त्र के अनुसार 'निर्दोष, शान्त व निर्भय' बनकर हम 'हर्यत' बनते हैं- - उत्तम गति कान्तिवाले। प्रभु का स्तवन करने से 'प्रागाथ' होते हैं। 'हर्यत प्रागाथ' ही अगले सूक्त के हैं :-

शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्याः ! वः=यूयम्। अत्र प्रथमार्थे द्वितीया। देवयज्यया=देवयागेन निमित्तेन। अग्निमग्निनामानमीशम्। स्तुत। अध्वरे+प्रयति=प्रकर्षेण गच्छति सति। अग्निं गायत। धीषु=सर्वेषु कर्मसु प्रथममग्निं प्रशंसत। अर्चति=गमनसमये। अग्निं स्मरत। क्षैत्राय+साधसे=क्षेत्रसाधनाय च। तमेवाग्निं याचध्वम् ॥१२॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - We adore Agni for driving away our enemies from us and for giving us peace and settlement with happiness. He is like a protector among people, giver of home and adored by sages.