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अ॒ग्निं सू॒नुं सह॑सो जा॒तवे॑दसं दा॒नाय॒ वार्या॑णाम् । द्वि॒ता यो भूद॒मृतो॒ मर्त्ये॒ष्वा होता॑ म॒न्द्रत॑मो वि॒शि ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

agniṁ sūnuṁ sahaso jātavedasaṁ dānāya vāryāṇām | dvitā yo bhūd amṛto martyeṣv ā hotā mandratamo viśi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒ग्निम् । सू॒नुम् । सह॑सः । जा॒तऽवे॑दसम् । दा॒नाय॑ । वार्या॑णाम् । द्वि॒ता । यः । भूत् । अ॒मृतः॑ । मर्त्ये॑षु । आ । होता॑ । म॒न्द्रऽत॑मः । वि॒शि ॥ ८.७१.११

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:71» मन्त्र:11 | अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:13» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:8» मन्त्र:11


शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे सर्वशक्ते ! (ते+देवस्य+रातिम्) तुम देव के दान को (अदेवः) महामहा दुष्ट पुरुष (माकिः+युयोत) नष्ट-भ्रष्ट न करे, क्योंकि (त्वम्+वसूनाम्+ईशिषे) तू ही सर्वसम्पत्तियों का अधीश्वर और शासक है ॥८॥
भावार्थभाषाः - इसका आशय है कि ईश्वर प्रतिक्षण वायु, जल, अन्न और आनन्द का दान दे रहा है। दुष्टजन इनको भी अपने आचरणों से गन्दा बनाते रहते हैं अथवा गौ, मेष, अश्व, हाथी आदि इनको चुरा-चुरा कर नष्ट न करने पावें, क्योंकि ईश्वर सबका रक्षक है ॥८॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

द्विता, अमृत: होता मन्द्रतमः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हमारी स्तुतिवाणियाँ [गिरः यन्तु = ] उस प्रभु की ओर प्राप्त हों जो (अग्निं) = अग्रणी हैं, (सहसः सूनुं) = बल के पुत्र-पुतले - पुञ्ज हैं, (जातवेदसं) = सर्वज्ञ व सर्वधन हैं। उस प्रभु को हमारी स्तुतिवाणियाँ प्राप्त हों, जिससे प्रभु (वार्याणाम् दानाय) = वरणीय धनों के देने के लिए हैं। [२] उस प्रभु का हम स्तवन करें (यः) = जो (मर्त्येषु) = मनुष्यों में (द्विता) = [द्वौ तनोति] दो का, ज्ञान व शक्ति का विस्तार करनेवाले (भूत्) = होते हैं। वे प्रभु (विशि) = सब प्रजाओं में (आ होता) = समन्तात् देनेवाले होते हैं, तथा (अमृतः) = नीरोगता को देनेवाले व (मन्द्रतमः) = [मादयितृतमः] अतिशयेन आनन्दित करनेवाले होते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभु का स्तवन करें। प्रभु हमें ज्ञान देंगे व शक्ति देंगे। प्रभु होता, अमृत व मन्द्रतम हैं।

शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे अग्ने ! ते=तव। देवस्य दत्तम्। रातिं=दानम्। अदेवः। माकिः+युयोत=पृथक् न कुर्य्यात्। हे ईश ! त्वं सर्वेषाम्। वसूनां=सम्पत्तीनाम्। ईशिषे=स्वामी भवसि ॥८॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Let our prayers reach Agni, all pervasive creator of energy, for the gift of cherished wealth and power. Agni is the immortal presence who appears among mortals in both physical and spiritual forms, universal yajaka, happiest and most blissful, arising in every home stead of the people.