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अच्छा॑ नः शी॒रशो॑चिषं॒ गिरो॑ यन्तु दर्श॒तम् । अच्छा॑ य॒ज्ञासो॒ नम॑सा पुरू॒वसुं॑ पुरुप्रश॒स्तमू॒तये॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

acchā naḥ śīraśociṣaṁ giro yantu darśatam | acchā yajñāso namasā purūvasum purupraśastam ūtaye ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अच्छ॑ । नः॒ । शी॒रऽशो॑चिषम् । गिरः॑ । य॒न्तु॒ । द॒र्श॒तम् । अच्छ॑ । य॒ज्ञासः॑ । नम॑सा । पु॒रु॒ऽवसु॑म् । पु॒रु॒ऽप्र॒श॒स्तम् । ऊ॒तये॑ ॥ ८.७१.१०

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:71» मन्त्र:10 | अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:12» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:8» मन्त्र:10


शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे ईश ! (नः) हमारी (उरुष्य) रक्षा कर और (जातवेदः) हे सर्वज्ञ सर्वसम्पत्ते ! (अघायते) जो सदा पाप किया करता है और दूसरों की अनिष्ट चिन्ता में रहता है, ऐसे पुरुष के निकट (मा+परा+दाः) हमको मत ले जा। तथा (दुराध्ये) जिसकी बुद्धि परद्रोह के कारण विकृत हो गई है, जो दूसरों के अमङ्गल का ही ध्यान करता है, (मर्ताय) ऐसे पापिष्ठ के निकट भी हमको मत ले जा ॥७॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य को उचित है कि अपनी ही जाति के अशुभ करने में न लगा रहे और सदा अनिष्टचिन्तन से अपने मन को दूषित न करे, अन्यथा महती हानि होगी ॥७॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

गिरः-यज्ञासः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (नः गिरः) = हमारी ज्ञानपूर्वक उच्चारित स्तुतिवाणियाँ (शीरशोचिषं) = काम-क्रोध आदि के विनाशक ज्ञानदीप्तिवाले (दर्शतम्) = दर्शनीय प्रभु की (अच्छा) = ओर (यन्तु) = जाएँ प्राप्त हों। हम प्रभु का स्तवन करें। [२] (नमसा) = नमन के साथ (यज्ञासः) = यज्ञ भी उस (पुरुवसुं) = पालक व पूरक धनोंवाले (पुरुप्रशस्तं) = अतिशयेन प्रशस्त प्रभु को अच्छा [ यन्तु ] प्राप्त हों, अर्थात् हम नमन के साथ यज्ञों के द्वारा प्रभु को प्राप्त करें। ऊतये ये प्रभु ही हमारे रक्षण के लिए हैं। हम प्रभु का उपासन करते हैं, प्रभु हमारा रक्षण।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- स्तुतिवाणियों, यज्ञों व नमन के द्वारा हम प्रभु का उपासन करें। प्रभु हमें सब आवश्यक धनों को [पुरुवसु] प्राप्त कराके तथा प्रशस्त जीवनवाला [ पुरुप्रशस्त] बनाकर रक्षित करेंगे।

शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे ईश ! नोऽस्मान्। उरुष्य=पालय। हे जातवेदः=सर्वज्ञ ! अघायते=योऽघं पापं करोति तस्मै। मा+परा+दाः=समर्पय। पुनः। दुराध्ये=दुष्टमनसे कपटिने मर्ताय च न परादाः ॥७॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Let all our songs of adoration rise fast to the refulgent and glorious Agni. Let our yajna with homage and havi move and reach the universally adored and universally honoured Agni for the sake of universal protection.