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अषा॑ळ्हमु॒ग्रं पृत॑नासु सास॒हिं यस्मि॑न्म॒हीरु॑रु॒ज्रय॑: । सं धे॒नवो॒ जाय॑माने अनोनवु॒र्द्याव॒: क्षामो॑ अनोनवुः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

aṣāḻham ugram pṛtanāsu sāsahiṁ yasmin mahīr urujrayaḥ | saṁ dhenavo jāyamāne anonavur dyāvaḥ kṣāmo anonavuḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अषा॑ळ्हम् । उ॒ग्रम् । पृत॑नासु । स॒स॒हिम् । यस्मि॑न् । म॒हीः । उ॒रु॒ऽज्रयः॑ । सम् । धे॒नवः॑ । जाय॑माने । अ॒नो॒न॒वुः॒ । द्यावः॑ । क्षामः॑ । अ॒नो॒न॒वुः॒ ॥ ८.७०.४

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:70» मन्त्र:4 | अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:8» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:8» मन्त्र:4


शिव शंकर शर्मा

पुनरपि इन्द्र की महिमा दिखलाते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जो इन्द्रवाच्य परमात्मा (चर्षणीनाम्) समस्त प्रजाओं का (राजा) राजा है, जो (रथैः) परम रमणीय इन सकल पदार्थों के साथ (याता) व्यापक है और (अध्रिगुः) अतिशय रक्षक है। रक्षा करने में जो विलम्ब नहीं करता। (विश्वासाम्+पृतनानाम्) जगत् की समस्त सेनाओं का विजेता है, (ज्येष्ठः) सर्वश्रेष्ठ और (वृत्रहा) निखिल विघ्नों का हन्ता है, (गृणे) उस ईश की मैं प्रार्थना स्तुति और गुण-गान करता हूँ ॥१॥
भावार्थभाषाः - वह सर्वधाता, विधाता और पिता पालक है, उसकी पूजा करो ॥१॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

द्यावः क्षामः अनोनवुः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (द्यावः) = ये द्युलोक में होनेवाले सूर्य व (क्षामः) = पृथिवीलोक उस प्रभु का ही (अनोनवुः) = अतिशयेन स्तवन करते हैं जो (अषाढं) = शत्रुओं से कभी पराभूत नहीं होते, (उग्रं) = उद्गूर्ण बलवाले व तेजस्वी हैं तथा (पृतनासु सासहिम्) = शत्रुसैन्यों में पराभव को करनेवाले हैं। [२] (यस्मिन् जायमाने) = जिसके प्रादुभूर्त होने पर (मही:) = महत्त्वपूर्ण, (उरुज्रयः) = महान् वेग वाली, अर्थात् हमें क्रियाओं में प्रेरित करनेवाली (धेनवः) = वेदवाणीरूप गौवें (सम् अनोनवुः) = सम्यक् शब्दायमान हो उठती है। हृदय में प्रभु का प्रकाश हुआ और वेदज्ञान हमें उस उस क्रिया में प्रेरित करने लगा।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- ये सूर्य आदि पदार्थ प्रभु की महिमा का ही प्रकाश कर रहे हैं। प्रभु का प्रकाश हृदय में होनेपर वेदवाणी हमारे लिए उत्कृष्ट कर्मों की प्रेरणा देनेवाली होती है।

शिव शंकर शर्मा

पुनरपीन्द्रस्य महिमानं दर्शयति।

पदार्थान्वयभाषाः - यः=इन्द्रवाच्येशः। चर्षणीनां=निखिलिप्रजानाम्। राजास्ति। यः खलु। रथैः रमणीयैः पदार्थैः। सह याता=गन्तास्ति। यः। अध्रिगुः=अतिशयरक्षिता। पुनः। विश्वासां=सर्वासाम्। पृतनानां=तरुतां=तारकः। ज्येष्ठः। यो वृत्रहा। तमिन्द्रम्। गृणे=प्रार्थयामि ॥१॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Unchallengeable, awful, victorious in cosmic dynamics, in whose pervasive presence great and tempestuous stars and planets, earths and heavens, all in unison move in order and do homage in reverence, such is Indra.