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अपा॒दिन्द्रो॒ अपा॑द॒ग्निर्विश्वे॑ दे॒वा अ॑मत्सत । वरु॑ण॒ इदि॒ह क्ष॑य॒त्तमापो॑ अ॒भ्य॑नूषत व॒त्सं सं॒शिश्व॑रीरिव ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

apād indro apād agnir viśve devā amatsata | varuṇa id iha kṣayat tam āpo abhy anūṣata vatsaṁ saṁśiśvarīr iva ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अपा॑त् । इन्द्रः॑ । अपा॑त् । अ॒ग्निः । विश्वे॑ । दे॒वाः । अ॒म॒त्स॒त॒ । वरु॑णः । इत् । इ॒ह । क्ष॒य॒त् । तम् । आपः॑ । अ॒भि । अ॒नू॒ष॒त॒ । व॒त्सम् । सं॒शिश्व॑रीःऽइव ॥ ८.६९.११

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:69» मन्त्र:11 | अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:7» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:11


शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (प्रियमेधासः) हे यज्ञप्रिय मनुष्यों ! तुम सब मिलकर उसकी (अर्चत) पूजा करो (प्रार्चत) अच्छे प्रकार उसको गाओ, अवश्यमेव (अर्चत) उसकी स्तुति प्रार्थना उपासना आदि सुकर्म करो। केवल तुम ही नहीं, (उत) किन्तु (पुत्रकाः) तुम्हारे पुत्र पौत्र और भावी सन्तान भी (अर्चन्तु) उसकी कीर्ति गावें। (न) जैसे (धृष्णु+पुरम्) विजयी पराक्रमी और महान् नगर की प्रशंसा लोग गाते हैं, तद्वत् उसको गाओ ॥८॥
भावार्थभाषाः - उसको छोड़ अन्य की उपासना या प्रार्थना न करो, यह इसका आशय है ॥८॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

इन्द्र-अग्नि देव

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (इन्द्रः) = एक जितेन्द्रिय पुरुष (अपात्) = इस सोम का पान करता है। (अग्निः) = प्रगतिशील पुरुष (अपात्) = इसको पीता है। (विश्वेदेवाः) = सब देव इस सोमपान में (अमत्सत) = हर्ष का अनुभव करते हैं। [२] (वरुणः) = वह पाप निवारक प्रभु (इत्) = निश्चय से (इह) = इस सोमपान करनेवाले के जीवन में (क्षयत्) = निवास करता है । (तम्) = उस प्रभु को (अपः) = कर्मों में व्याप्त होनेवाली प्रजाएँ (अभ्यनूषत) = स्तुत करती हैं। उसी प्रकार स्तुति करती हैं, (इव) = जैसे (संशिश्वरी:) = उत्तम बछड़ोंवाली गाएँ (वत्सम्) = बछड़े के प्रति जाती हुई शब्द को करती है। इसी प्रकार प्रेम से पूर्ण होकर ये कर्मों में व्याप्त होनेवाली प्रजाएँ अपने प्रिय प्रभु के प्रति स्तुति शब्दों को बोलती हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमपान हमें 'इन्द्र, अग्नि व देव' बनाता है, शरीर में सबल [इन्द्र] मस्तिष्क में प्रकाशमय [अग्नि] तथा मन में 'देव'। सोमपान करनेवालों में ही परमात्मा का निवास होता है। ये कर्मों में व्याप्त रहकर प्रभु का स्मरण करते हैं।

शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे प्रियमेधासः=यज्ञप्रिया मनुष्याः ! यूयम्। परमात्मानम्। अर्चत। प्रार्चत। पुनः पुनः। तमेवार्चत। तमेव गायत, स्तुत, प्रशंसत, प्रार्थयत। न केवलं यूयमेव। उत=अपि च। युष्माकं पुत्रका अपि तमर्चन्तु। धृष्णु=धर्षणशीलम्। महत्। पुरं+न=पुरमिव। अर्चत=भूषयत। तस्य कीर्तिं गायत ॥८॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, the soul, seeking honour, fame and power, loves the soma of ananda. Agni, leading scholar advancing into the light of knowledge, loves the soma of ananda. All brilliancies of nature and humanity love the ecstasy of soma. Varuna, powers of love and justice, all abide in the ecstasy of soma. All seekers of yajnic action and divine dedication love the soma of spiritual ananda of their creation like the mother loving her child.