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शश्व॑न्तं॒ हि प्र॑चेतसः प्रति॒यन्तं॑ चि॒देन॑सः । देवा॑: कृणु॒थ जी॒वसे॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

śaśvantaṁ hi pracetasaḥ pratiyantaṁ cid enasaḥ | devāḥ kṛṇutha jīvase ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

शश्व॑न्तम् । हि । प्र॒ऽचे॒त॒सः॒ । प्र॒ति॒ऽयन्त॑म् । चि॒त् । एन॑सः । देवाः॑ । कृ॒णु॒थ । जी॒वसे॑ ॥ ८.६७.१७

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:67» मन्त्र:17 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:54» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:17


शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (आदित्यासः) हे सभासदों ! (वृकाणाम्) हिंसक, चोर, डाकू और द्रोही असत्यवादी और वृक पशु के समान भयङ्कर जनों के (आस्नः) मुख से (नः) हम प्रजाओं को (मुमोचत) बचाओ (अदिते) हे सभे ! (बद्धम्+स्तेनम्) बद्ध चोर को जैसे छोड़ते हैं, वैसे दुर्भिक्षादि पापों से पीड़ित और बद्ध हम लोगों को बचाइये ॥१४॥
भावार्थभाषाः - प्रजा कितने प्रकारों से लूटी जाती है, इसका दृश्य यदि देखना हो, तो आँख फैलाकर ग्राम-ग्राम में देखो। मनुष्य वृकों और व्याघ्रों से भी बढ़कर स्वजातियों के हिंसक बन रहे हैं। सभा को उचित है कि इन उपद्रवों से प्रजा की रक्षा करे ॥१४॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

क्रियाशीलता व पापनिवृत्ति

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (प्रचेतसः) = प्रकृष्ट ज्ञानोंवाले (देवा:) = देववृत्ति के पुरुषो ! शश्वन्तं = [शश प्लुतगतौ ] - प्लुप्त गतिवाले- स्फूतवाले सतत क्रियाशील और (हि) = निश्चय से (एनसः प्रतियन्तं चित्) = पाप से निवृत्त होते हुए इस उपासक को (जीवसे) = दीर्घजीवन के लिए (कृणुथ) = करिये। [२] ज्ञानी देवों का सम्पर्क हमें क्रियाशील व पापनिवृत्त बनाए। ऐसा बनाकर यह देवसम्पर्क हमें दीर्घजीवी बनाता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम ज्ञानी देवों के सम्पर्क में रहें। क्रियाशीलता व पाप की ओर न रुझानवाले इस प्रकार हम दीर्घजीवन को प्राप्त करेंगे।

शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे आदित्यासः=आदित्याः सभ्याः ! वृकाणां=हिंसकानां वृकवद्भयङ्कराणाम्। आस्नः=आस्यात्। नः=अस्मान्। मुमोचत=मोचत। हे अदिते=सभे ! बद्धं स्तेनमिव दुर्भिक्षादिपापैः पीडितान् जनान् मोचय ॥१४॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O wise brilliancies, whoever turns to you ever and any time, even from sin, pray sustain and strengthen him to live his life to the full.