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यः श॒क्रो मृ॒क्षो अश्व्यो॒ यो वा॒ कीजो॑ हिर॒ण्यय॑: । स ऊ॒र्वस्य॑ रेजय॒त्यपा॑वृति॒मिन्द्रो॒ गव्य॑स्य वृत्र॒हा ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yaḥ śakro mṛkṣo aśvyo yo vā kījo hiraṇyayaḥ | sa ūrvasya rejayaty apāvṛtim indro gavyasya vṛtrahā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यः । श॒क्रः । मृ॒क्षः । अश्व्यः॑ । यः । वा॒ । कीजः॑ । हि॒र॒ण्ययः॑ । सः । ऊ॒र्वस्य॑ । रे॒ज॒य॒ति॒ । अप॑ऽवृतिम् । इन्द्रः॑ । गव्य॑स्य । वृ॒त्र॒ऽहा ॥ ८.६६.३

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:66» मन्त्र:3 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:48» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:3


शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे ईश ! यद्यपि मैं (दुर्गहस्य) दुःख में निमग्न हूँ, तथापि (मे) मेरे (नपातः) पौत्र, दौहित्र आदि जन (सहस्रेण) आपके लिए हुए अपरिमित धन से (सुराधसः) धनसम्पन्न होवें और (देवेषु) श्रेष्ठ पुरुषों में वे (श्रवः) यश, अन्न, पशु, हिरण्य और आपकी कृपा (अक्रत) पावें ॥१२॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र से अपने पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र और दौहित्रादिकों को सुखी होने के लिये ईश्वर से प्रार्थना करें ॥१२॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'शक्र हिरण्यय' प्रभु

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः) = जो प्रभु (शक्रः) सर्वशक्तिमान् हैं, (मृक्षः) = अतिशयेन शुद्ध हैं, (अश्व्यः) = उत्तम इन्द्रियाश्वों के देनेवाले हैं, वा अथवा (यः) = जो (कीज:) = [किम् इदानीं जातः] अद्भुत (हिरण्यय) = हितरमणीय ज्योतिवाले हैं। [२] (सः) = वे (इन्द्रः) = सर्वशत्रुसंहारक प्रभु वृत्रहा = वासनाओं को विनष्ट करने वाले हैं। ये प्रभु ही (उर्वस्य गव्यस्य) = हमें पापों से बचानेवाले वेदरूप ज्ञान की वाणियों के समूह की (आवृतिम्) = आवृति को (अपरेजयति) = कम्पित करके दूर करते हैं, अर्थात् हमारे लिए इन ज्ञान की वाणियों के समूह को प्रकट करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु शक्तिमान्, शुद्ध उत्तम इन्द्रियाश्वों के दाता व अद्भुत ज्योतिर्मय हैं। वे वासना को विनष्ट करके हमारे लिए वेदवाणियों के समूह प्रकट करते हैं।

शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - दुर्गहस्य=दुःखं गाहमानस्य। मे=मम। नपातः=नपाताः= पौत्रदौहित्रादयः। सहस्रेण=अपरिमितेन धनेन। सुराधसः=सुधनाः। भवन्तु। तथा। देवेषु=श्रेष्ठपुरुषेषु। श्रवः=यशः अन्नं पश्वादिकञ्च। अक्रत=लभन्ताम् ॥१२॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra who is mighty of action, pure and purifying, great achiever, and wondrous rich in wealth and golden grace, who shakes off the erosion of land fertility and cattle wealth and augments produce and prosperity, destroyer of want, ignorance and evil as he is.