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अ॒स्मे रु॒द्रा मे॒हना॒ पर्व॑तासो वृत्र॒हत्ये॒ भर॑हूतौ स॒जोषा॑: । यः शंस॑ते स्तुव॒ते धायि॑ प॒ज्र इन्द्र॑ज्येष्ठा अ॒स्माँ अ॑वन्तु दे॒वाः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

asme rudrā mehanā parvatāso vṛtrahatye bharahūtau sajoṣāḥ | yaḥ śaṁsate stuvate dhāyi pajra indrajyeṣṭhā asmām̐ avantu devāḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒स्मे इति॑ । रु॒द्राः । मे॒हना॑ । पर्व॑तासः । वृ॒त्र॒ऽहत्ये॑ । भर॑ऽहूतौ । स॒ऽजोषाः॑ । यः । शंस॑ते । स्तु॒व॒ते । धायि॑ । प॒ज्रः । इन्द्र॑ऽज्येष्टाः । अ॒स्मान् । अ॒व॒न्तु॒ । दे॒वाः ॥ ८.६३.१२

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:63» मन्त्र:12 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:43» मन्त्र:6 | मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:12


शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (अस्य+वृष्णोः) सर्वत्र प्रत्यक्ष के समान भासमान इस वर्षाकारी जगदीश्वर से (वि+ओदने) विविध प्रकार के अन्नों को पाकर यह जीवलोक (जीवसे) जीवन के लिये (उरु+क्रमिष्ट) वारंवार क्रीड़ा करता है, (न) जैसे (पश्वः) पशु (यवम्) वास को पाकर (आददे) आनन्द प्राप्त करते हैं ॥९॥
भावार्थभाषाः - इसका अभिप्राय यह है कि ईश्वर जीवलोक को बहुत अन्न देवें, जिससे इसमें उत्सव हो और ये प्राणी प्रसन्न हो उसकी कीर्ति गावें ॥९॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

इन्द्रज्येष्ठाः देवाः अस्मान् अवन्तु

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (मेहना) = शरीर में शक्ति के सेचन के द्वारा (पर्वतासः) = हमारा पूरण करनेवाले (रुद्राः) = रोगों के द्रावक - दूर भगानेवाले प्राण वृत्रहत्ये वासना के विनाश के निमित्तभूत (भरहूतौ) = संग्राम में पुकार के होने पर (अस्मे) = हमारे लिए (सजोषा) = समान रूप से प्रीतिवाले हों। प्राणों की अनुकूलता से हम शरीर में शक्ति का सेचन करते हुए रोगशून्य व वासनाशून्य बनते हैं। [२] (यः) = जो (शंसते) = ज्ञान की वाणियों का शंसन करनेवाले तथा (स्तुवते) = स्तवन करनेवाले के लिए (पज्रः) = शक्तिशाली होता हुआ (धायि) = धारण किया जाता है वह इन्द्र, तथा (इन्द्रज्येष्ठाः देवाः) = इन्द्र है ज्येष्ठ जिनमें वे सब देव (अस्मान् अवन्तु) = हमारा रक्षण करें। सब देवों के साथ महादेव हमारे लिए कल्याणकर हों।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणयाम द्वारा अंग-प्रत्यंग को शक्ति से सिक्त करके हम रोगों व वासनाओं को जीतें । शक्ति के धारण करनेवाले प्रभु सब देवों के साथ हमारा कल्याण करें। अगले सूक्त के भी ऋषि 'प्रगाथ काण्व' व देवता 'इन्द्र' हैं-

शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - अस्य वृष्णोः=प्रत्यक्षादिव भासमानात्। वर्षितुरिन्द्रात्। अत्र पञ्चम्यर्थे षष्ठी। जनः। व्योदने=विविधे ओदने भोज्यद्रव्ये लब्धे सति। जीवसे=जीवनाय। उरु=बहु। क्रमिष्ट=भूयोभूयः क्रीडतीत्यर्थः। अत्र दृष्टान्तः, यवन्न=यथा यवं=घासं प्राप्य। पश्वः=पशवः। आददे=हर्षमाददते=गृह्णन्ति तद्वत् ॥९॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, lord ruler of power and progress, for us, in our fight against suffering, may the Rudras, powers of justice and desperation, mighty generous clouds of shower, mountains and great men, all loving and cooperative, indeed whoever fast and strong may hasten and advance for the celebrant and worshipper, all the wisest and seniormost brilliant powers of generosity in nature and humanity, come and help us in our struggle for the conquest of darkness, want, evil and ignorance prevailing in society.