वांछित मन्त्र चुनें
373 बार पढ़ा गया

सम॑नेव वपुष्य॒तः कृ॒णव॒न्मानु॑षा यु॒गा । वि॒दे तदिन्द्र॒श्चेत॑न॒मध॑ श्रु॒तो भ॒द्रा इन्द्र॑स्य रा॒तय॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

samaneva vapuṣyataḥ kṛṇavan mānuṣā yugā | vide tad indraś cetanam adha śruto bhadrā indrasya rātayaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सम॑नाऽइव । व॒पु॒ष्य॒तः । कृ॒णव॑त् । मानु॑षा । यु॒गा । वि॒दे । तत् । इन्द्रः॑ । चेत॑नम् । अध॑ । श्रु॒तः । भ॒द्राः । इन्द्र॑स्य । रा॒तयः॑ ॥ ८.६२.९

373 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:62» मन्त्र:9 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:41» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:9


शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (ऋचीषमः) ऋचाओं और ज्ञानों से स्तवनीय और पूजनीय वह महेश्वर हम प्राणियों के सब कर्मों को (अव+चष्टे) नीचे देखता है (अवटान्+इव+मानुषः) जैसे मनुष्य कूपादिकों को नीचे देखता है। देखकर (जुष्ट्वी) यदि हमारे शुभ होते हैं, तो वह प्रसन्न और यदि अशुभ अमङ्गल और अन्याय को वह देखता है, तो अप्रसन्न होता है। हे मनुष्यों ! जो (दक्षस्य) ईश्वर के मार्ग पर चलते हुए उन्नति कर रहे हैं और (सोमिनः) सदा शुभकर्मों में लगे रहते हैं, उनके आत्मा को (सखायम्) जगत् के साथ मित्र बनाता है और (युजम्+कृणुते) सब कार्य के लिए योग्य बनाता है, अतः वही महान् देव उपास्य है ॥६॥
भावार्थभाषाः - ईश्वर उसी का साहाय्य करता है, जो स्वयं उद्योगी है और उसके पथ पर चलता है ॥६॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वपुष्यतः = समना

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (इन्द्रः) = वासनारूप शत्रुओं का संहार करनेवाले प्रभु (मानुषा युगा) = मानव दम्पतियों को (समना इव) = समान मनवाला-सा एक हृदयवाला-सा-अभिन्नहृदय व (वपुष्यतः) = उत्तम शरीर की कामना वाला करते हैं। [२] वे प्रभु (तत् चेतनं) = उस प्रज्ञान को (विदे) = प्राप्त कराते हैं, जिससे कि मनुष्य शरीरों को स्वस्थ रखते हैं [वपुष्यतः] तथा मनों को अविरुद्ध बना पाते हैं [समना ] । (अध) = अब इन स्वस्थ शरीरोंवाले व समान मनोंवाले मानुष युगों में (श्रुतः) = ये प्रभु ही श्रुत होते हैं। ये प्रभु की ही महिमा का गायन करते हैं कि (इन्द्रस्य) = परमैश्वर्यशाली प्रभु की (रातयः) = देन (भद्रा:) = कल्याणकर हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-उपासक मानवदम्पतियों को प्रभु उत्तम शरीरवाला व समान मनवाला बनाते हैं। ऐसा ही वे ज्ञान देते हैं। प्रभु की देन कितना ही कल्याण करनेवाली हैं।

शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - ऋचीषमः=ऋग्भिः स्तवनीयः। ऋचां=ज्ञानानां स्वामी वा परमेश्वरः। अस्मान्। अवचष्टे=अधः पश्यति। अत्र दृष्टान्तः। अवटान्+इव मानुषः=यथा मनुष्यः। अवटान्=कूपादीन् अधः पश्यति। पुनः। दृष्ट्वा। जुष्ट्वी=प्रसन्नो भूत्वा। दक्षस्य=प्रवृद्धस्य। सोमिनः=शुभकर्मिणः पुरुषस्य। आत्मानम्। सखायम्। युजम्=योग्यञ्च। कृणुते=करोति ॥६॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Like men united in assembly or forces united in battle, he joins people into assemblies and communities unto himself. That knowledge of art, Indra knows, and for that he is renowned and celebrated. Great and good are the gifts of Indra.