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विश्वे॑ त इन्द्र वी॒र्यं॑ दे॒वा अनु॒ क्रतुं॑ ददुः । भुवो॒ विश्व॑स्य॒ गोप॑तिः पुरुष्टुत भ॒द्रा इन्द्र॑स्य रा॒तय॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

viśve ta indra vīryaṁ devā anu kratuṁ daduḥ | bhuvo viśvasya gopatiḥ puruṣṭuta bhadrā indrasya rātayaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

विश्वे॑ । ते॒ । इ॒न्द्र॒ । वी॒र्य॑म् । दे॒वाः । अनु॑ । क्रतु॑म् । द॒दुः॒ । भुवः॑ । विश्व॑स्य । गोऽप॑तिः । पु॒रु॒ऽस्तु॒त॒ । भ॒द्राः । इन्द्र॑स्य । रा॒तयः॑ ॥ ८.६२.७

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:62» मन्त्र:7 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:41» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:7


शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे इन्द्र ! (शविष्ठ) हे परम बलवान् विश्वेश्वर ! हम उपासक (ते) तेरे महत्त्व को (वर्धना) बढ़ानेवाले (ब्रह्माणि) स्तोत्रों को (कृणवाम) विशेषरूप से गा रहे हैं, अतः तू (आ+याहि) यहाँ आने की कृपा कर। हे इन्द्र ! (येभिः) जिन स्तुतियों से प्रसन्न होकर (इह+श्रवस्यते) इस जगत् में कीर्ति अन्नादिक चाहनेवाले शिष्टजनों का तू (भद्रम्+चाकनः) कल्याण किया करता है ॥४॥
भावार्थभाषाः - उस महान् देव की आज्ञा पर चलते हुए उसी की कीर्ति का गान सब कोई करें, क्योंकि सबको कल्याण वही दे रहा है ॥४॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वीर्यम्-क्रतुम्

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = सर्वशक्तिमन् देव! (विश्वे देवा:) = सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, पृथिवी, जल, अग्नि, [तेज], वायु, आकाश, मेघ आदि सब देव ते= आपके (वीर्यम्) = शक्ति के (अनु) = अनुसार ही (ददुः) = हमारे लिए शक्ति को देते हैं। इसी प्रकार सब विद्वान् आपके (क्रतुं) = प्रज्ञान के अनुसार ही हमारे लिए प्रज्ञान को देनेवाले होते हैं। सूर्य आदि में शक्ति की स्थापना आप ही करते हैं । ज्ञानियों में ज्ञान को देनेवाले भी आप ही हैं। [२] हे (पुरुष्टुत) = बहुतों से स्तुति किये गये प्रभो ! आप ही (विश्वस्य) = सब (गोपतिः भुवः) = किरणों व ज्ञान की वाणियों के स्वामी हैं । इन्द्रस्य परमैश्वर्यशाली आपकी (रातयः) = देन (भद्राः) = कल्याणकर हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सब सूर्य आदि देवों में शक्ति का स्थापन प्रभु ही करते हैं तथा सब ज्ञानियों में प्रज्ञान का स्थापन करनेवाले प्रभु ही हैं। किरणों व ज्ञान की वाणियों के स्वामी प्रभु ही हैं।

शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे इन्द्र ! हे शविष्ठ=अतिशयबलवन् ! वयम्। वर्धना=यशसोर्वर्धकानि। ते=तव। ब्रह्माणि=स्तोत्राणि। कृणवाम=कुर्मः। अतोऽत्र आयाहि। येभिः स्तोत्रैः प्रसन्नस्त्वम्। इह श्रवस्यते=कीर्तिमिच्छते जनाय। भद्रं+चाकनः=कामयसे करोषि। भद्रा इत्यादि पूर्ववत् ॥४॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, universally celebrated and exalted, ruler and protector of the worlds of the universe, all divinities of nature and humanity in obedience and pursuit of your divine acts bear your generous strength and vitality. Great and good are the gifts of Indra.