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त्वं ह्येहि॒ चेर॑वे वि॒दा भगं॒ वसु॑त्तये । उद्वा॑वृषस्व मघव॒न्गवि॑ष्टय॒ उदि॒न्द्राश्व॑मिष्टये ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tvaṁ hy ehi cerave vidā bhagaṁ vasuttaye | ud vāvṛṣasva maghavan gaviṣṭaya ud indrāśvamiṣṭaye ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

त्वम् । हि । आ । इ॒हि॒ । चेर॑वे । वि॒दाः । भग॑म् । वसु॑त्तये । उत् । व॒वृ॒ष॒स्व॒ । म॒घ॒ऽव॒न् । गोऽइ॑ष्टये । उत् । इ॒न्द्र॒ । अश्व॑म्ऽइष्टये ॥ ८.६१.७

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:61» मन्त्र:7 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:37» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:7


शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (अप्रामिसत्य) हे अपरिणामि सत्य, हे अपरिवर्तनीय सत्य, हे सत्य में दृढ़तम, हे सत्यसन्ध (मघवन्) हे धनवन् ! (इन्द्र) हे इन्द्र परमेश्वर ! (तथा) वैसा (इत्) ही (असत्) होता है (यथा) जैसा (क्रत्वा) विज्ञानरूप कर्म से (वशः) तू चाहता है। हे भगवन् (शिप्रिन्) हे शिष्टजनमनोरथप्रपूरक (अद्रिवः) हे महादण्डधर देव ! (तव+अवसा) तेरी रक्षा के कारण (मक्षु) शीघ्र ही (यन्तः+चित्) सांसारिक अभ्युदय और परमोन्नति को प्राप्त करते हुए हम उपासक सम्प्रति आपकी कृपा से (वाजम्) परम विज्ञान और मोक्ष सुख (सनेम) पावें ॥४॥
भावार्थभाषाः - इसके द्वारा ईश्वर को धन्यवाद और प्रार्थना की जाती है। जो जन ईश्वर की कृपा से सांसारिक सब पदार्थों से सम्पन्न हैं, वे ईश्वर की प्राप्ति के लिये यत्न किया करें ॥४॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

भग-गौ-अश्व

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्रभो ! (त्वम्) = आप (हि) = निश्चय से (चेरवे) = चरणशील के लिए पुरुषार्थी के लिए (हि) = प्राप्त होइए तथा (भगं विदाः) = ऐश्वर्य को प्राप्त कराइए जिससे (वसुत्तये) = [वसुदानाय ] वह धन का दान कर सके। [२] हे (मघवन्) = ऐश्वर्यशालिन् प्रभो! आप (गविष्टये) = ज्ञानेन्द्रियों की कामनावाले के लिए (उद्वावृषस्व) = खूब ही उसमें शक्ति का सेचन कीजिए तथा (अश्वमिष्टये) = कर्मेन्द्रियों की इच्छावाले करिये। इस शक्ति से सेचन के द्वारा उसकी ज्ञानेन्द्रियों व कर्मेन्द्रियों को अपना कार्य करने में सशक्त बनाइए ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - श्रमशील को प्रभु प्राप्त होते हैं और उसे दान देने के लिए धन प्राप्त कराते तथा उसे शक्तिसम्पन्न कर समर्थ ज्ञानेन्द्रियों व कर्मेन्द्रियोंवाला करते हैं।

शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे अप्रामिसत्य ! “अप्रामि=अपरिणामि सत्यं यस्य। हे अपरिवर्तनीय सत्य हे सत्य।” हे दृढतम ! हे मघवन्=धनवन् ! हे इन्द्र=परमेश्वर ! तथा+इद्+असत्=तथैव भवति। यथा त्वम्। क्रत्वा=विज्ञानकर्मणा। वशः=कामयेः। हे शिप्रिन्= शिष्टजनमनोरथप्रपूरक ! हे अद्रिवः=महादण्डधर ! वयम्। तव+अवसा=रक्षणेन। मक्षु=शीघ्रमेव। यन्तः चित्=संसारे अभ्युदयं गच्छन्तः सन्तः। वाजं=विज्ञानं च। सनेम=संभजेम ॥४॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Come to give gifts of wealth and honour to the devotee so that the people may be happy and prosperous. O lord of honour and majesty, Indra, bring us showers of the wealth of cows, lands, knowledge and culture for the seekers of light, and horses, advancement and achievement for the seekers of progress.