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आ वृ॑षस्व पुरूवसो सु॒तस्ये॒न्द्रान्ध॑सः । वि॒द्मा हि त्वा॑ हरिवः पृ॒त्सु सा॑स॒हिमधृ॑ष्टं चिद्दधृ॒ष्वणि॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā vṛṣasva purūvaso sutasyendrāndhasaḥ | vidmā hi tvā harivaḥ pṛtsu sāsahim adhṛṣṭaṁ cid dadhṛṣvaṇim ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ । वृ॒ष॒स्व॒ । पु॒रु॒व॒सो॒ इति॑ पुरुऽवसो । सु॒तस्य॑ । इ॒न्द्र॒ । अन्ध॑सः । वि॒द्म । हि । त्वा॒ । ह॒रि॒ऽवः॒ । पृ॒त्ऽसु । स॒स॒हिम् । अधृ॑ष्टम् । चि॒त् । द॒धृ॒ष्वणि॑म् ॥ ८.६१.३

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:61» मन्त्र:3 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:36» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:3


शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (आघृणीवसो) हे प्रकाशमय धनोपेत हे प्रकाशयुक्त वासदाता ईश्वर ! (नः) हम लोगों के मध्य (रक्षः+मा+वेशीत्) दुष्ट, दुर्जन, पिशुन, महादुराचारी, अन्यायी डाकू आदि प्रवेश न करें, ऐसी कृपा कर तथा (यातुमावताम्) उन जगत्पीड़क राक्षसों की (यातुः+मा) पीड़ा हमको पीड़ित न करे और (अग्ने) हे सर्वाधार महेश ! (अनिराम्) दरिद्रता (क्षुधम्) क्षुधा और (रक्षस्विनः) राक्षस गण और उनके सुहृद्गणों को (परो+गव्यूति) अत्यन्त दूर देश में (अपसेध) ले जा ॥२०॥
भावार्थभाषाः - जगत् में ऐसा न्याय और शिक्षा फैलावे कि मनुष्य परस्पर द्वेष द्रोह करना छोड़ मित्र होकर रहें। तब ही वे सुखी रहकर ईश्वर की भी उपासना कर सकते हैं ॥२०॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'अधृष्ट दधृष्वणि' प्रभु

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (पुरूवसो) = पालक व पूरक वसुओंवाले (इन्द्र) = परमैश्वर्यशाली प्रभो ! आप (सुतस्य) = उत्पन्न हुए-हुए (अन्धसः) = सोम का (आवृषस्व) = हमारे अंग-प्रत्यंग में सेचन करिये। आपका उपासन हमें वासनाओं से बचाकर सोमरक्षण के योग्य बनाए। [२] हे (हरिवः) = प्रशस्त इन्द्रियाश्वों को प्राप्त करानेवाले प्रभो ! हम (त्वा) = आपको (हि) = निश्चय से (विद्म) = जानते हैं कि आप (पृत्सु) = संग्रामों में (सासहिम्) = शत्रुओं को कुचलनेवाले हैं। (अधुष्टं चित्) = निश्चय से अधर्षणीय हैं और (दधृष्वणिम्) = शत्रुओं का धर्षण करनेवाले हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभुस्मरण हमारे शरीरों में सोम रक्षण का साधन बनता है। इस प्रकार प्रभु हमें संग्रामों में विजयी व अधर्षणीय बनाते हैं।

शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे आघृणी वसो ! हे आदीप्तधन हे प्रदीप्तवासप्रद ! हे परमेश ! नोऽस्मान्। रक्षः=दुष्टो जनः। मा+आवेशीत्=सर्वतो प्रविशतु। तथा यातुमावताम्=यातुर्यातना पीडा। तद्वताम्=यातुधानानाम् यातुः पीडा। मा प्रविशतु। तथा हे भगवन् अग्ने ! अनिराम्=इराऽन्नम्। अन्नाभावं दारिद्र्यम्। क्षुधम्=बुभुक्षाम्। रक्षस्विनः=रक्षसां मित्राणि च। परोगव्यूति=क्रोशद्वयाद्देशात् परस्तात्। एतदुपलक्षणम्। अत्यन्तं दुरदेशेऽपसेध। परिहर ॥२०॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, lord of universal wealth, honour and excellence, haven and home of all life in existence, give us showers of the purest distilled soma, food for health and divine joy. O lord of the dynamics of existence, we know you, fearless and unconquerable hero in battles.