वांछित मन्त्र चुनें
391 बार पढ़ा गया

त्वमित्स॒प्रथा॑ अ॒स्यग्ने॑ त्रातॠ॒तस्क॒विः । त्वां विप्रा॑सः समिधान दीदिव॒ आ वि॑वासन्ति वे॒धस॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tvam it saprathā asy agne trātar ṛtas kaviḥ | tvāṁ viprāsaḥ samidhāna dīdiva ā vivāsanti vedhasaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

त्वम् । इत् । स॒ऽप्रथाः॑ । अ॒सि॒ । अग्ने॑ । त्रा॒तः॒ । ऋ॒तः । क॒विः । त्वाम् । विप्रा॑सः । स॒म्ऽइ॒धा॒न॒ । दी॒दि॒ऽवः॒ । आ । वि॒वा॒स॒न्ति॒ । वे॒धसः॑ ॥ ८.६०.५

391 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:60» मन्त्र:5 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:32» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:5


शिव शंकर शर्मा

यज्ञ में अग्नि नाम से परमात्मा ही पूज्य होता है, यह इससे दिखलाते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (सहसः+सूनो) हे जगदुत्पादक (अङ्गिरः) हे अङ्गिन् हे सर्वगत देव ! (अध्वरे) यज्ञ में (त्वा+हि) तुझको ही (अच्छ) प्राप्त करने के लिये (स्रुचः) अग्निहोत्री के स्रुवा आदि साधन (चरन्ति) कार्य्य में प्रयुक्त होते हैं, वैसे (अग्निम्) अग्नि नाम से प्रसिद्ध तुझको ही हम उपासक (ईमहे) प्रार्थना करते हैं, जो तू (ऊर्जः+नपातम्) बलप्रदाता है, (घृतकेशम्) जलादिकों का ईश है। पुनः (यज्ञेषु+पूर्व्यम्) यज्ञों में सब पदार्थों को पूर्ण करनेवाला तू ही है ॥२॥
भावार्थभाषाः - यह सम्पूर्ण सूक्त यज्ञिय अग्नि में भी घट सकता है, अतः बहुत से विशेषण ऐसे रक्खे गए हैं कि वे दोनों के वाचक हों, दोनों अर्थों को देने में समर्थ हों, जैसे (सहसः+सूनुः) इसका अग्नि पक्ष में बल का पुत्र अर्थ है, क्योंकि बलपूर्वक रगड़ से अग्नि उत्पन्न होता है। इत्यादि ॥२॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सप्रथाः ऋतः कविः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (त्रातः) = रक्षक (अग्ने) = अग्रणी प्रभो ! (त्वम् इत्) = आप ही (सप्रथा:) = अतिशयेन विस्तारवाले (असि) = हैं। (ऋतः) = सत्यस्वरूप हैं, (कविः) = क्रान्तदर्शी हैं। [२] हे (समिधान) = समानरूप से सदा दीप्त (दीदिवः) = देदीप्यमान प्रभो ! (वेधसः) = उत्तम यज्ञादि कर्मों के करनेवाले (विप्रासः) = ज्ञानी पुरुष (त्वां) = आपको (आविवासन्ति) = पूजते हैं। वस्तुतः प्रभु का पूजन इसी प्रकार होता है कि हम ज्ञान को प्राप्त करें और यज्ञादि उत्तम कर्मों में प्रवृत्त हों।
भावार्थभाषाः - भावार्थ:- प्रभु सर्वत्र व्याप्त-सत्यस्वरूप व क्रान्तदर्शी हैं। उन देदीप्यमान प्रभु का उपासन ज्ञान व यज्ञ द्वारा होता है।

शिव शंकर शर्मा

यज्ञेऽग्निनाम्ना परमात्मैव पूज्यत इत्यनया दर्शयति।

पदार्थान्वयभाषाः - हे सहसः सूनो=जगदुत्पादक ! “सहसा बलेन जायत इति सहो जगत्। सूते जनयतीति सूनुः षूङ् प्राणिगर्भविमोचने, यद्वा षू प्रेरणे। सुवते प्रेरयति जगदिदमिति सूनुः”। हे अङ्गिरः=अङ्गिन् सर्वत्र संगतदेव ! अध्वरे=यज्ञे। त्वा हि=त्वामेव। अच्छ=अभिप्राप्तुम्। स्रुचश्चरन्ति। ईदृशं त्वामेव वयमीमहे=प्रार्थयामहे। कीदृशम् ऊर्जो नपातम्। बलस्य न पातयितारं बलस्य प्रदातारमित्यर्थः। पुनः घृतकेशम्=घृतकानां जलादीनामीशम्। पुनः। अग्निं=सर्वगतम्। पुनः। यज्ञेषु। पूर्व्यम्=सर्वपूरकम् ॥२॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, you are infinitely expansive, boundless, all saviour, eternally right poet of cosmic rectitude, omniscient creator. Self-refulgent ever, light of the universe, the wise sages and masters of law and right action glorify you as the lord supreme.