वांछित मन्त्र चुनें
389 बार पढ़ा गया

अद्रो॑घ॒मा व॑होश॒तो य॑विष्ठ्य दे॒वाँ अ॑जस्र वी॒तये॑ । अ॒भि प्रयां॑सि॒ सुधि॒ता व॑सो गहि॒ मन्द॑स्व धी॒तिभि॑र्हि॒तः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

adrogham ā vahośato yaviṣṭhya devām̐ ajasra vītaye | abhi prayāṁsi sudhitā vaso gahi mandasva dhītibhir hitaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अद्रो॑घम् । आ । व॒ह॒ । उ॒श॒तः । य॒वि॒ष्ठ्य॒ । दे॒वान् । अ॒ज॒स्र॒ । वी॒तये॑ । अ॒भि । प्रयां॑सि । सु॒ऽधि॒ता । आ । व॒सो॒ इति॑ । ग॒हि॒ । मन्द॑स्व । धी॒तिऽभिः॑ । हि॒तः ॥ ८.६०.४

389 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:60» मन्त्र:4 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:32» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:4


शिव शंकर शर्मा

प्रथम अग्नि नाम से परमात्मा की स्तुति करते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे सर्वशक्ते सर्वाधार ईश ! (त्वा) तुझको ही (वृणीमहे) हम उपासक स्तुति, प्रार्थना, पूजा इत्यादि के लिये स्वीकार करते हैं। तू (अग्निभिः) सूर्य्य अग्नि प्रभृति आग्नेय शक्तियों के साथ (आ+याहि) इस संसार में आ और आकर इसकी सुरक्षा कर। जो तू (होतारम्) सर्वधनप्रदाता है। हे ईश ! पुनः (प्रयता) अपने-२ कार्य्य में नियत और (हविष्मती) अग्निहोत्रादि शुभकर्मवती प्रजा (त्वाम्+आ+अनक्तु) तुझको ही अलङ्कृत करें। जो तू (यजिष्ठम्) परम यजनीय है, वह तू (बर्हिः) हृदय प्रदेश को (आसदे) प्राप्त कर वहाँ बैठ ॥१॥
भावार्थभाषाः - अग्नि यह नाम ईश्वर का परम प्रसिद्ध है। उसकी स्तुति प्रार्थना हम मनुष्य सदा करें ॥१॥
टिप्पणी: १−यह सूक्त भौतिक अग्नि पक्ष में भी घटता है।

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

देवसम्पर्क-सात्विक अन्न-ध्यान

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (यविष्ठ्य) = बुराइयों को हमारे से पृथक् करनेवाले (अजस्र:) = अविनाशिन् प्रभो ! (अद्रोघं) = द्रोह की भावना से रहित मुझे (वीतये) = अज्ञानान्धकार के ध्वंस के लिए (उशत:) = हमारे भले की कामनावाले देवान् देवों के प्रति (आवह) = प्राप्त कराइए। इन देवों के सम्पर्क में हमारा अज्ञान दूर हो जाए। [२] हे (वसो) = हमारे निवास को उत्तम बनानेवाले प्रभो ! (सुधिता) = सम्यक् स्थापित किये गये (प्रयांसि) = अन्नों की (अभि) = ओर (गहि) = हमें प्राप्त कराइए। हम इन सात्त्विक अन्नों का ही सेवन करनेवाले बनें। हे प्रभो ! (धीतिभिः) = ध्यानवृत्तियों व स्तुतियों के द्वारा (हितः) = हृदय में स्थापित हुए हुए आप (मन्दस्व) = हमें आनन्दित करिये।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु हमें प्रिय विद्वानों के सम्पर्क से निवृत्त अज्ञानान्धकारवाला करें। सात्त्विक अन्नों के सेवन से हमें उत्तम निवासवाला बनाएँ। ध्यान द्वारा हृदय में स्थापित होकर प्रभु हमें आनन्दित करें।

शिव शंकर शर्मा

प्रथममग्निनाम्ना परमात्मानं स्तौति।

पदार्थान्वयभाषाः - हे अग्ने ! सर्वशक्ते ! सर्वाधार ईश ! त्वा=त्वां वयं वृणीमहे। त्वम्। अग्निभिः=सूर्य्यादिभिरग्निभिरिह रक्षणाय आयाहि। कीदृशम्। होतारम्=दातारम्। पुनः। यजिष्ठं=अतिशयेन यजनीयम्। पुनः। त्वा=त्वाम्। प्रयता=नियता। हविष्मती=अग्निहोत्रादिशुभकर्मवती प्रजा। आनक्तु=अलंकरोतु। हे भगवन् ! त्वं बर्हिः=हृदयप्रदेशम्। आसदे=आसद्योपविश ॥१॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Most youthful Agni, eternal power and presence, bring the loving and generous divinities to receive the homage and bless the innocent and guileless yajaka. O lord of the world’s wealth, haven and home of all, accept the most cherished offerings and, adored with our sincere thoughts and acts of yajna, rejoice yourself.