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अ॒ग्निम॑ग्निं वो॒ अध्रि॑गुं हु॒वेम॑ वृ॒क्तब॑र्हिषः । अ॒ग्निं हि॒तप्र॑यसः शश्व॒तीष्वा होता॑रं चर्षणी॒नाम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

agnim-agniṁ vo adhriguṁ huvema vṛktabarhiṣaḥ | agniṁ hitaprayasaḥ śaśvatīṣv ā hotāraṁ carṣaṇīnām ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒ग्निम्ऽअ॑ग्निम् । वः॒ । अध्रि॑ऽगुम् । हु॒वेम॑ । वृ॒क्तऽब॑र्हिषः । अ॒ग्निम् । हि॒तऽप्र॑यसः । श॒श्व॒तीषु॑ । आ । होता॑रम् । च॒र्ष॒णी॒नाम् ॥ ८.६०.१७

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:60» मन्त्र:17 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:35» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:17


शिव शंकर शर्मा

फिर उसी अर्थ को कहते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे सर्वगत (वृषभ) हे निखिल कामवर्षक देव ! दुर्जनों के प्रति जाज्वल्यमान ! (ते) तेरे (जम्भासः) दन्त (नहि+प्रतिधृषे) अनिवार्य्य हैं, उन्हें कोई निवारण नहीं कर सकता, (यत्) क्योंकि (वितिष्ठसे) तू सर्वत्र व्याप्त होकर वर्तमान है, जीवों के सुकर्मों और दुष्कर्मों दोनों को तू देखता है। (होतः) हे स्वयं होता ! (सः+त्वम्) वह तू (हविः) परोपकार और निजोपकार के लिये अग्नि में प्रक्षिप्त घृतादि शाकल्य को (सुहुतम्+कृधि) यथा स्थान में भस्म कर ले जा। हे भगवन् ! (वार्य्या) स्वीकरणीय और (पुरु) बहुत धन सम्पत्ति और विज्ञान (वंस्व) दे ॥१४॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्यो ! परमात्मा के न्याय से डरो और अपनी आवश्यकता के लिये उसी के निकट प्रार्थना करो ॥१४॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वृक्तबर्हिषः हितप्रयसः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (वः) = तुम सबके (अग्निं) = अग्रणी उस (अध्रिगुं) = अधृतगमनवाले (अग्नि) = प्रकाशस्वरूप प्रभु को (हुवेम) = हम पुकारते हैं। उस प्रभु की गति को कोई भी रोक नहीं सकता। (वृक्तबर्हिषः) = [वृजी वर्जने] जिसमें से वासनाओं का वर्जन किया गया है ऐसे वासनाशून्य हृदयवाले, (हितप्रयसः) [निहितहविष्का:] = अग्निकुण्ड में हवि का स्थापन करनेवाले यज्ञशील हम (अग्निं) = उस अग्रणी प्रभु को पुकारते हैं। [२] उस प्रभु को हम पुकारते हैं जो (शश्वतीषु) = इस सनातन प्रजाओं में (चर्षणीनाम्) = श्रमशील मनुष्यों के (आ होतारं) = समन्तात् सब आवश्यक पदार्थों के प्राप्त करानेवाले हैं अथवा यज्ञों के साधक हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम वासनाशून्य हृदयवाले व यज्ञशील बनकर उस प्रकाशमय प्रभु का आराधन करते हैं। वस्तुत: प्रभु ही हमारे यज्ञों को सिद्ध करते हैं और हमें आवश्यक पदार्थों को प्राप्त कराते हैं।

शिव शंकर शर्मा

पुनस्तमर्थमाह।

पदार्थान्वयभाषाः - हे अग्ने ! हे वृषभ=कामानां वर्षितः ! ते=तव। जम्भासः=जम्भा दन्ताः। नहि प्रतिधृषे=प्रतिधर्षितुं न शक्या निवारयितुं न शक्या इत्यर्थः। यद्=यस्मात्। त्वं वितिष्ठसे=विविधं तिष्ठसि। सर्वं स्थानमावृत्य तिष्ठसि। हे होतः ! स त्वम्। नोऽस्माकम्। हविः सुहुतम्। कृधि=कुरु। तथा नोऽस्मभ्यम्। वार्य्या=वरणीयानि। पुरु=पुरूणि बहूनि धनानि वंस्व=देहि ॥१४॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - For your sake, O people of the world, we on the seats of holy grass invoke Agni, one form after another of the irresistible universal power of nature and divinity, and having collected our offerings ready, we light and serve the fire, high priest of cosmic yajna among all the communities of humanity over the lands.