पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अर्ये) = स्वामी में (हि) = ही (आशिषः सन्ति) = सब इच्छाएँ व आकांक्षाएँ हैं, अर्थात् प्रभु से ही सब इच्छाओं के पूर्ण होने की आशा है । (इन्द्रे) = उस परमैश्वर्यशाली शत्रुविद्रावक प्रभु में ही (जनानाम् आयुः) = मनुष्यों की आयु है, अर्थात् प्रभु की उपासना ही हमें काम, क्रोध, लोभ आदि शत्रुओं से बचाकर दीर्घजीवन प्रदान करती है। [२] हे (मघवन्) = ऐश्वर्यवन् प्रभो ! आप (अस्मान्) = हमें अवसे रक्षण के लिए (उपनक्षस्व) = समीपता से प्राप्त होइये। आपकी समीपता में हम किसी भी से आक्रान्त नहीं हो पाते। हे प्रभो ! आप (पिप्युषीम्) = हमारा आप्यायन करनेवाली (इषम्) = प्रेरणा को (धुक्षस्व) = हमारे अन्दर प्रपूरित करिये। आपकी प्रेरणा से ठीक मार्ग पर चलते हुए हम सदा अपना आप्यायन कर पाएँ ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु ही हमारी आकांक्षाओं को पूर्ण करते हैं, दीर्घजीवन प्रदान करते हैं, हमारा रक्षण करते हुए प्रभु हमें वह प्रेरणा प्राप्त कराते हैं, जो हमारा वर्धन करनेवाली होती है।