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आ नो॒ विश्वे॑षां॒ रसं॒ मध्व॑: सिञ्च॒न्त्वद्र॑यः । ये प॑रा॒वति॑ सुन्वि॒रे जने॒ष्वा ये अ॑र्वा॒वतीन्द॑वः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā no viśveṣāṁ rasam madhvaḥ siñcantv adrayaḥ | ye parāvati sunvire janeṣv ā ye arvāvatīndavaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ । नः॒ । विश्वे॑षाम् । रस॑म् । मध्वः॑ । सि॒ञ्च॒न्तु॒ । अद्र॑यः । ये । प॒रा॒ऽवति॑ । सु॒न्वि॒रे । जने॑षु । आ । ये । अ॒र्वा॒ऽवति॑ । इन्द॑वः ॥ ८.५३.३

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:53» मन्त्र:3 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:22» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:3


हरिशरण सिद्धान्तालंकार

परावति- अर्पावति

पदार्थान्वयभाषाः - [१] प्रभु जीव से कहते हैं कि (अद्रयः) = प्रभु का आदर करनेवाले उपासक लोग (नः) = हमारे से उत्पन्न किये गये (विश्वेषां रसं) = सब ओषधियों के सारभूत अथवा सब अंगों को रसमय बनानेवाले (मध्वः) = सोम का (आ सिञ्चन्तु) = सब अंग-प्रत्यगों में सेचन करें। [२] उन सोमकणों का सेचन करें (ये) = जो (जनेषु) = लोगों में (परावति) = उस सुदूर मोक्षलोक की प्राप्ति के निमित्त (सुन्विरे) = उत्पन्न किये जाते हैं और ये जो (अर्वावति) = इस (अर्वाक्) = समीपस्थ इहलोक के लिए (आ) = समन्तात् सुत किये जाते हैं। इन सोमकणों के रक्षण से ही इहलोक व परलोक का कल्याण होता है । इहलोक के अभ्युदय व परलोक के निःश्रेयस का निर्भर इस सोमरक्षण पर ही है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु के आदेश के अनुसार हम शरीर में ही सोम का सेचन करें। यह सोम ही अभ्युदय व निःश्रेयस का साधक है।

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - May the clouds and mountains, and the generous sages among people, whether far off or close by who distil for us the honey sweet essence of all the facts of life, bless us like showers of rain.