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यथा॒ मनौ॒ विव॑स्वति॒ सोमं॑ श॒क्रापि॑बः सु॒तम् । यथा॑ त्रि॒ते छन्द॑ इन्द्र॒ जुजो॑षस्या॒यौ मा॑दयसे॒ सचा॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yathā manau vivasvati somaṁ śakrāpibaḥ sutam | yathā trite chanda indra jujoṣasy āyau mādayase sacā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यथा॑ । मनौ॑ । विव॑स्वति । सोम॑म् । श॒क्र॒ । अपि॑बः । सु॒तम् । यथा॑ । त्रि॒ते । छन्दः॑ । इ॒न्द्र॒ । जुजो॑षसि । आ॒यौ । मा॒द॒य॒से॒ । सचा॑ ॥ ८.५२.१

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:52» मन्त्र:1 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:20» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:1


हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'मनु विवास्वान् त्रित आयु'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यथा) = जिस प्रकार (मनौ) = विचारशील पुरुष में तथा (विवस्वति) = अज्ञानान्धकार को विवासित करनेवाले पुरुष में, हे (शक्र) = सर्वशक्तिमन् प्रभो ! आप (सुतं सोमं) = उत्पन्न हुए हुए सोम का (अपिब:) = पान करते हैं। जब हम विचारशील बनते हैं और अज्ञानान्धकार को दूर करने के लिए स्वाध्यायशील होते हैं तो वासनाओं से बचे रहते हैं और इस प्रकार सोम का रक्षण करते हैं। [२] हे (इन्द्र) = शत्रुओं का विद्रावण करनेवाले प्रभो ! (यथा) = जिस प्रकार आप (त्रिते) = काम-क्रोध-लोभ को तैर जानेवाले में (छन्दः) = इन ज्ञान की वाणियों को (जुजोषसि) = प्रीतिपूर्वक सेवन कराते हैं इसी तरह (आयौ) = गतिशील पुरुष में (सचा) = समवेत होकर (मादयसे) = उसे आनन्दित करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम 'मनु विवस्वान्' विचारशील व स्वाध्यायशील बनकर सोम को शरीर में सुरक्षित रखें। 'त्रित' बनकर ज्ञान की वाणियों के प्रति प्रेमवाले हों। 'आयु' बनकर प्रभु से मेलवाले होते हुए आनन्दित हों।

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Omnipotent Indra, just as you drink, protect and promote the soma of the ecstasy of divine vision distilled and collected in the mind of the brilliant meditative sage, as you join the divine joy of the devotee who has achieved threefold freedom of body, mind and soul, so you join the divine joy and celebration at the heart of the sage of experience and discriminative vision.