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य उ॒क्थेभि॒र्न वि॒न्धते॑ चि॒किद्य ऋ॑षि॒चोद॑नः । इन्द्रं॒ तमच्छा॑ वद॒ नव्य॑स्या म॒त्यरि॑ष्यन्तं॒ न भोज॑से ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ya ukthebhir na vindhate cikid ya ṛṣicodanaḥ | indraṁ tam acchā vada navyasyā maty ariṣyantaṁ na bhojase ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यः । उ॒क्थेभिः॑ । न । वि॒न्धते॑ । चि॒कित् । यः । ऋ॒षि॒ऽचोद॑नः । इन्द्र॑म् । तम् । अच्छ॑ । व॒द॒ । नव्य॑स्या । म॒ती । अरि॑ष्यन्तम् । न । भोज॑से ॥ ८.५१.३

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:51» मन्त्र:3 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:18» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:3


हरिशरण सिद्धान्तालंकार

चिकिद्यः ऋषिचोदनः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः) = जो (उक्थेभिः) = स्तोत्रों के द्वारा (न विन्धते) = पूर्णतया विद्ध नहीं होते, अर्थात् जो स्तोत्रों द्वारा पूरा-पूरा जाने नहीं जाते, (चिकिद्य:) = जानने योग्य वेद्य हैं, (ऋषिचोदनः) = तत्त्वदर्शियों को प्रेरित करनेवाले हैं, (तम्) = उस (इन्द्रम् अच्छ) = प्रभु को लक्ष्य करके (नव्यस्या मती) = अतिशयेन स्तुत्य मति के द्वारा (वद) = स्तुतिवचनों का उच्चारण कर । [२] (अरिष्यन्तं न) = किसी भी प्रकार हिंसित न होते हुए के समान उस प्रभु का तु स्तवन कर । स्तुति किये गये प्रभु (भोजसे) = तेरे पालन के लिए होते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु ही वेद्य हैं, पर किन्हीं पर शब्दों से प्रभु के पूर्ण वर्णन का सम्भव नहीं । इन्हीं प्रभु का हमें स्तवन करना चाहिए। ये प्रभु हमारा पालन करते हैं।

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - He who is not attained by mere words of song, who knows, and who inspires the sages to know, that Indra you adore and worship well with sincere mind and thought in order to experience the lord as one who never hurts anyone, who always loves and blesses.