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आ न॒: सोमे॑ स्वध्व॒र इ॑या॒नो अत्यो॒ न तो॑शते । यं ते॑ स्वदाव॒न्त्स्वद॑न्ति गू॒र्तय॑: पौ॒रे छ॑न्दयसे॒ हव॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā naḥ some svadhvara iyāno atyo na tośate | yaṁ te svadāvan svadanti gūrtayaḥ paure chandayase havam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ । नः॒ । सोमे॑ । सु॒ऽअ॒ध्व॒रे । इ॒या॒नः । अत्यः॑ । न । तो॒श॒ते॒ । यम् । ते॒ । स्व॒दा॒ऽव॒न् । स्वद॑न्ति । गू॒र्त्यः॑ । पौ॒रे । छ॒न्द॒य॒से॒ । हव॑म् ॥ ८.५०.५

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:50» मन्त्र:5 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:16» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:5


हरिशरण सिद्धान्तालंकार

गूर्तयः पौराः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्रभो ! आप (नः) = हमारे (सोमे) = सोमरक्षण के होने पर तथा (स्वध्वरे) = उत्तम हिंसारहित कर्मों के होने पर (इयानः अत्यः न) = प्रेरित किये जाते हुए अश्व के समान (आ तोशते) = समन्तात् शत्रुओं का विनाश करते हैं। जैसे अश्वारोही से प्रेरित अश्व शत्रुसैन्य पर आक्रमण करता है, इसी प्रकार प्रभु हमारे शत्रुओं का संहार करते हैं। [२] हे (स्वदावन्) = सम्पत्तियों के देनेवालो प्रभो ! (यं) = जिस (ते) = आपके इस सोम का (गूर्तयः) = उद्यमशील लोग (स्वदन्ति) = आनन्द अनुभव करते हैं, उद्यमशील (पौरे) = पालन व पूरण करनेवाले लोगों में ही आपके (हवं) = पुकार को (छन्दयसे) = चाहते हैं। इन पौरों से की जानेवाली प्रार्थना ही आपको प्रिय होती है। श्रमशीलता हमें सोमरक्षण के योग्य बनाती है। रक्षित सोम से हम अपना पूरण करनेवाले 'पौर' बनते हैं। इन पौरों की आराधना ही प्रभु को प्रिय होती है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण के होने पर व हिंसारहित कर्मों में लगाने पर प्रभु हमारे शत्रुओं को विनष्ट कर डालते हैं। श्रमशीलता से सोमरक्षण करता हुआ अपना पूरण करनेवाला व्यक्ति ही प्रभु का प्रिय होता है।

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, lord of the holy yajna of creation, come to our soma yajna, reaching like the constant flow of joy where soma flows and pleases. O lord most generous and connoisseur of taste, the songs of praise please you, and while the soma flows you delight in our adoration.