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यदीं॑ सु॒तास॒ इन्द॑वो॒ऽभि प्रि॒यमम॑न्दिषुः । आपो॒ न धा॑यि॒ सव॑नं म॒ आ व॑सो॒ दुघा॑ इ॒वोप॑ दा॒शुषे॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yad īṁ sutāsa indavo bhi priyam amandiṣuḥ | āpo na dhāyi savanam ma ā vaso dughā ivopa dāśuṣe ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यत् । ई॒म् । सु॒तासः॑ । इन्द॑वः । अ॒भि । प्रि॒यम् । अम॑न्दिषुः । आपः॑ । न । धा॒यि॒ । सव॑नम् । मे॒ । आ । व॒सो॒ इति॑ । दुघा॑ऽइव । उप॑ । दा॒शुषे॑ ॥ ८.५०.३

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:50» मन्त्र:3 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:16» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:3


हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सोमरक्षण से 'प्रभुस्तवन-यज्ञशीलता पूरणता'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यद्) = जब (ईम्) = निश्चय से (सुतासः इन्दवः) = उत्पन्न हुए हुए सोमकण (प्रियम् अभि) = उस प्रिय प्रभु को लक्ष्य करके (अमन्दिषुः) = स्तुति में प्रवृत्त होते हैं। अर्थात् इन सोमकणों का रक्षक प्रीति को अनुभव करता हुआ प्रभुस्तवन में प्रवृत्त होता है। उस समय (आपः न) = इन रेतःकणों के समान [आपः रेतो भूत्या ] (मे) = मेरे अन्दर (सवनं) = यज्ञ का (धायि) = धारण होता है। यह सोमरक्षक पुरुष यज्ञशील बनता है। [२] हे (वसो) = हमारे निवास को उत्तम बनानेवाले प्रभो! उपदाशुषे आपके समीप अपना अर्पण करनेवाले के लिए ये सोमकण (आदुघाः इव) = समन्तात् पूरण करनेवाले से होते हैं। प्रभु के सान्निध्य से सोम का रक्षण होता है। रक्षित सोम हमारी कमियों को दूर करके पूरण करनेवाला होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण [१] हमें प्रभुस्तवन की वृत्तिवाला बनाता है। [२] इससे हम यज्ञशील बनते हैं और [३] ये हमारी कमियों को दूर करके हमारा पूरण करते हैं।

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - When the flowing drops of yajnic homage of soma please and exhilarate this dear lord, then, O lord of wealth, excellence and grace, like the showers of rain and generous cow, pray bless the invocation, homage and oblations of the yajna with plenty for the generous yajamana.