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यथा॒ कण्वे॑ मघव॒न्मेधे॑ अध्व॒रे दी॒र्घनी॑थे॒ दमू॑नसि । यथा॒ गोश॑र्ये॒ असि॑षासो अद्रिवो॒ मयि॑ गो॒त्रं ह॑रि॒श्रिय॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yathā kaṇve maghavan medhe adhvare dīrghanīthe damūnasi | yathā gośarye asiṣāso adrivo mayi gotraṁ hariśriyam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यथा॑ । कण्वे॑ । म॒घ॒ऽव॒न् । मेधे॑ । अ॒ध्व॒रे । दी॒र्घऽनी॑थे । दमू॑नसि । यथा॑ । गोऽश॑र्ये । असि॑सासः । अ॒द्रि॒ऽवः॒ । मयि॑ । गो॒त्रम् । ह॒रि॒ऽश्रिय॑म् ॥ ८.५०.१०

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:50» मन्त्र:10 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:17» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:10


हरिशरण सिद्धान्तालंकार

कण्व - गोशर्य

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अद्रिवः) = वज्रहस्त प्रभो ! (मघवन्) = ऐश्वर्यशालिन् प्रभो ! (यथा) = जैसे (कण्वे) = मेधावी पुरुष में, (मेधे) = यज्ञमय जीवनवाले पुरुष में, (अध्वरे) = हिंसारहित व्यक्ति में, (दीर्घनीथे) = तम से शून्य [विदीर्ण तमवाले] प्रणयन [मार्ग] वाले में, (दमूनसि) = दान्त मनवाले पुरुष में आप (हरिश्रियं) = अज्ञान के हरण करनेवाली श्री से युक्त (गोत्रं) = ज्ञान की वाणियों के समूह को (असनोः) = देते हैं, उसी प्रकार (मयि) = मेरे में भी इस ज्ञानवाणी समूह को प्राप्त कराइए। [२] हे प्रभो ! (यथा) = जेसे (गोशर्ये) = [गोभिः शृणोति ] इन ज्ञान की वाणियों द्वारा सब बुराइयों को शीर्ण करनेवाले में आप श्री को प्राप्त कराते हैं, उसी प्रकार मुझे भी श्रीसम्पन्न करिये।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम कण्व - मेध - अध्वर- दीर्घनीथ दमूना व गोशर्य बनकर अज्ञानविध्वंसक युक्त ज्ञानवाणी समूह को प्राप्त करें।
अन्य संदर्भ: सूचना:- यहाँ सूक्त ४९ व ५० के मन्त्रों की समता द्रष्टव्य है-

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O lord of glory, Indra, as much as you have granted for the intellectual, for the scholar teacher, for the yajna, for the long time leader, for the home and for the man of self control, so much, O lord of the clouds and mountains, pray grant me too for guidance on the path to divinity.