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प्र सु श्रु॒तं सु॒राध॑स॒मर्चा॑ श॒क्रम॒भिष्ट॑ये । यः सु॑न्व॒ते स्तु॑व॒ते काम्यं॒ वसु॑ स॒हस्रे॑णेव॒ मंह॑ते ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pra su śrutaṁ surādhasam arcā śakram abhiṣṭaye | yaḥ sunvate stuvate kāmyaṁ vasu sahasreṇeva maṁhate ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र । सु । श्रु॒तम् । सु॒ऽराध॑सम् । अर्च॑ । श॒क्रम् । अ॒भिष्ट॑ये । यः । सु॒न्व॒ते । स्तु॒व॒ते । काम्य॑म् । वसु॑ । स॒हस्रे॑णऽइव । मंह॑ते ॥ ८.५०.१

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:50» मन्त्र:1 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:16» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:1


हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ज्ञान ऐश्वर्य व शक्ति

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सुश्रुतं) = उत्तम ज्ञानवाले, (सुराधसम्) = उत्तम ऐश्वर्यवाले (शक्रं) = सर्वशक्तिमान् प्रभु को (अभिष्टये) = इष्टप्राप्ति की (पीतये प्र असे) = प्रकर्षेण पूजित कर । पूजित प्रभु उपासक को भी 'ज्ञान ऐश्वर्य व शक्ति' प्राप्त कराएँगे। [२] उस प्रभु का तू पूजन कर (यः) = जो (सुन्वते) = सोम का सम्पादन करनेवाले अथवा यज्ञशील (स्तुवते) = स्तोता के लिए (काम्यं वसु) = चाहनेयोग्य धन को (सहस्रेण इव) = सहस्रों की तरह (मंहते) = देते हैं। सहस्रों व्यक्ति भी वह धन नहीं प्राप्त कराते जो वे प्रभु स्तोता के लिए अकेले ही देनेवाले होते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम 'ज्ञानी, ऐश्वर्यशाली, शक्तिमान् प्रभु की अर्चना करें। यज्ञशील व स्तोता बनें और प्रभु से कमनीय धनों को प्राप्त करें।

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - For the sake of life’s fulfilment, honour and adore Indra, renowned and mighty master and controller of the superstructure of existence, who grants desired wealth, power and honour, and augments it a thousandfold for the celebrant who seeks and works for the soma joy and excellence of life with yajnic effort.