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उ॒ग्रं न वी॒रं नम॒सोप॑ सेदिम॒ विभू॑ति॒मक्षि॑तावसुम् । उ॒द्रीव॑ वज्रिन्नव॒तो न सि॑ञ्च॒ते क्षर॑न्तीन्द्र धी॒तय॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ugraṁ na vīraṁ namasopa sedima vibhūtim akṣitāvasum | udrīva vajrinn avato na siñcate kṣarantīndra dhītayaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उ॒ग्रम् । न । वी॒रम् । नम॑सा । उप॑ । से॒दि॒म॒ । विऽभू॑तिम् । अक्षि॑तऽवसुम् । उ॒द्रीऽइ॑व । व॒ज्रि॒न् । अ॒व॒तः । न । सि॒ञ्च॒ते । क्षर॑न्ति । इ॒न्द्र॒ । धी॒तयः॑ ॥ ८.४९.६

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:49» मन्त्र:6 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:15» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:6


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

विभूतिम् अक्षितावसुम्

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हम (उग्रं न) = अत्यन्त तेजस्वी के समान (वीरं) = शत्रुओं को कम्पित करनेवाले (विभूतिम्) = विशिष्ट ऐश्वर्यवाले (अक्षितावसुम्) = अक्षीण धनवाले प्रभु को (नमसा) = नमन के द्वारा (उपसेदिम) = उपासित करते हैं। [२] हे (वज्रिन्) = शत्रुओं के संहारक वज्र को हाथ में लिये हुए प्रभो! आप (उद्रीवण अवतः न) = जलपूर्ण कूप की तरह (सिञ्चते) = हमें सुखों व शक्तियों से सींचते हैं। कुआँ जल से सींचता है, प्रभु शक्ति से। हे (इन्द्र) = सर्वशक्तिमन् प्रभो ! (धीतयः क्षरन्ति) = हमारी स्तुतियाँ आपकी ओर ही प्रवाहित होती हैं। यह प्रभुस्तवन ही हमें ऐश्वर्यों व शक्ति को देनेवाला होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम उस प्रभु के चरणों में नम्रता से उपस्थित हों, जो वीर व विभूतिमान हैं। प्रभु हमें शक्ति से सिक्त करेंगे और उस शक्ति से ही हम शत्रुओं को शीर्ण कर पाएँगें ।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - With homage and adorations, we approach Indra, illustrious, brave, glorious, lord of inexhaustible wealth, honour and ultimate shelter. As an overflowing spring fills a well with water, so do our thoughts and imagination create the flow of spontaneous praise for the generous lord’s satisfaction.