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आ न॒: स्तोम॒मुप॑ द्र॒वद्धि॑या॒नो अश्वो॒ न सोतृ॑भिः । यं ते॑ स्वधावन्त्स्व॒दय॑न्ति धे॒नव॒ इन्द्र॒ कण्वे॑षु रा॒तय॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā naḥ stomam upa dravad dhiyāno aśvo na sotṛbhiḥ | yaṁ te svadhāvan svadayanti dhenava indra kaṇveṣu rātayaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ । नः॒ । स्तोम॑म् । उप॑ । द्र॒वत् । हि॒या॒नः । अश्वः॑ । न । सोतृ॑ऽभिः । यम् । ते॒ । स्व॒धा॒ऽव॒न् । स्व॒दय॑न्ति । धे॒नवः॑ । इन्द्र॑ । कण्वे॑षु । रा॒तयः॑ ॥ ८.४९.५

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:49» मन्त्र:5 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:14» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:5


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभुस्तवन व दानशीलता

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सोतृभिः) = सोम का अभिषव [ उत्पादन] करनेवालों से शरीर में सोम का सम्पादन करनेवालों से (हियान:) = प्रेरित किये जाते हुए, हे प्रभो! आप (नः स्तोमम्) = हमारी स्तुति को (आ उपद्रवत्) = प्राप्त होइये । हम आपके स्तोता बनें। आप हमारे लिए (अश्वः न) = लक्ष्य स्थान पर पहुँचनेवाले अश्व के समान हैं। आपके द्वारा ही तो हम जीवनयात्रा को पूर्ण कर सकेंगे। [२] हे (स्वधावन्) = आत्मधारणशक्तिवाले (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (यं) = जिस आपके सोम का (धेनवः) = [धेट् पाने] सोम को शरीर में पीनेवाले स्तोता लोग (स्वदयन्ति) = आस्वाद लेते हैं, वे (कण्वेषु) = बुद्धिमन् पुरुषों में (रातयः) = दानशील होते हैं। भोगवृत्ति से ऊपर उठकर दानशील बनकर ही वे सोमरक्षण में समर्थ होते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण के लिए आवश्यक है कि हम प्रभुस्तवन करें और दानशील बनकर भोगवृत्ति से ऊपर उठें।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, lord of joy and fulfilment, love and generosity, come to accept our song of adoration like a courser urged on and rushing to its destination, a song created like soma by the pressers which the profuse voices of the wise and your gifts showered on the celebrants sweeten all the more and energise.