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आ त्वा॑ सु॒तास॒ इन्द॑वो॒ मदा॒ य इ॑न्द्र गिर्वणः । आपो॒ न व॑ज्रि॒न्नन्वो॒क्यं१॒॑ सर॑: पृ॒णन्ति॑ शूर॒ राध॑से ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā tvā sutāsa indavo madā ya indra girvaṇaḥ | āpo na vajrinn anv okyaṁ saraḥ pṛṇanti śūra rādhase ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ । त्वा॒ । सु॒तासः॑ । इन्द॑वः । मदाः॑ । ये । इ॒न्द्र॒ । गि॒र्व॒णः॒ । आपः॑ । न । व॒ज्रि॒न् । अनु॑ । ओ॒क्य॑म् । सरः॑ । पृ॒णन्ति॑ । शू॒र॒ । राध॑से ॥ ८.४९.३

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:49» मन्त्र:3 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:14» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:3


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (सोम) हे सर्वप्रिय जगद्रचयिता ईश ! (त्वम्) तू (नः) हम लोगों को (विश्वतः) सर्व प्रकार और सर्व दिशाओं से (वयोधाः) अन्न दे रहा है, (त्वम्+स्वर्विद्) तू ही सुख देनेवाला है, तू ही (नृचक्षाः) मनुष्यों के निखिल कर्मों को देखनेवाला है, वह तू (आविश) हमारे हृदय में प्रवेश कर। (इन्दो) हे जगदाह्लादक ! (त्वम्+सजोषाः) तू हम लोगों के साथ प्रसन्न होता हुआ (पश्चातात्) पीछे (उत+वा+पुरस्तात्) या आगे (ऊतिभिः) रक्षाओं और साहाय्यों से (नः+पाहि) हमारी रक्षा कर ॥१५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सोमरक्षण व सफलता

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (गिर्वणः) = ज्ञान की वाणियों का सम्भजन करनवाले शूर शत्रुओं को शीर्ण करनेवाले (इन्द्र) = शत्रुविद्रावक जितेन्द्रिय पुरुष ! (त्वा) = तुझे (सुतासः) = उत्पन्न हुए-हुए (ये मदा:) = जो उल्लासजनक (इन्दवः) = सोमकण हैं, वे (पृणन्ति) = पूरित करते हैं। इस प्रकार पूरित करते हैं (न) = जैसे (ओक्यं सरः) = निवासस्थान व आश्रयभूत तालाब को (आपः) = जल (ननु) = निश्चय से पूरित करनेवाले होते हैं। [२] इन सोमकणों को अपने में पूरित करके ही तू (राधसे) = सफलता के लिए होता है। ये सोमकण तुझे शक्तिसम्पन्न बनाते हैं। यह शक्ति तेरी सफलता का साधन बनती है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- ज्ञान प्राप्ति में लगे रहना व जितेन्द्रिय बनने का प्रयत्न करना ही सोमरक्षण का साधन है। सुरक्षित सोम सफलता को देनेवाला है।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे सोम ! त्वम्। नोऽस्माकम्। विश्वतः=सर्वतः। वयोधाः=अन्नदाता। त्वम्। स्वर्विद्=सुखप्रापकः। पुनः। नृचक्षाः=मनुष्याणां निखिलकर्मद्रष्टा। स त्वमाविश। हे इन्दो ! त्वं सजोषाः=सहप्रियभागाः सन्। ऊतिभिः=रक्षणैः सह। पश्चातात्=पश्चात्। उत वा पुरस्तात्। नोऽस्मान् पाहि ॥१५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, celebrated lord of the thunderbolt, may the songs of adoration presented by the celebrant with prayers for desired wealth and means of success, flowing spontaneous like ecstatic streams of soma, please and exhilarate you to fullness of kindness and grace as flowing waters, brooks and rivers, fill their original home, the lake and the sea.