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तस्मि॒न्हि सन्त्यू॒तयो॒ विश्वा॒ अभी॑रव॒: सचा॑ । तमा व॑हन्तु॒ सप्त॑यः पुरू॒वसुं॒ मदा॑य॒ हर॑यः सु॒तम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tasmin hi santy ūtayo viśvā abhīravaḥ sacā | tam ā vahantu saptayaḥ purūvasum madāya harayaḥ sutam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

तस्मि॑न् । हि । सन्ति॑ । ऊ॒तयः॑ । विश्वाः॑ । अभी॑रवः । सचा॑ । तम् । आ । व॒ह॒न्तु॒ । सप्त॑यः । पु॒रु॒ऽवसु॑म् । मदा॑य । हर॑यः । सु॒तम् ॥ ८.४६.७

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:46» मन्त्र:7 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:2» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:7


शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (घ) यह विषय सर्वत्र प्रसिद्ध है कि (सः+मर्त्यः) वह मनुष्य (सुनीथः) सुयज्ञ होता है अर्थात् उस मनुष्य के सकल वैदिक या लौकिक कर्म पुष्पित और सुफलित होते हैं, यद्वा वह अच्छे प्रकार जगत् में चलाया जाता है, (यम्) जिसकी (मरुतः) राज्यसेनाएँ (अद्रुहः) द्रोहरहित होकर (पान्ति) रक्षा करती हैं, (यम्+अर्यमा) जिसकी रक्षा श्रेष्ठ पुरुष करते हैं, (मित्रः) ब्राह्मण=मित्रभूत ब्रह्मवित् पुरुष जिसकी रक्षा करते हैं ॥४॥
भावार्थभाषाः - जिसके ऊपर ईश्वर तथा लोक की कृपा हो, वही श्रेष्ठ पुरुष है। अतः प्रत्येक मनुष्य को शुभकर्म में प्रवृत्त होना चाहिये। शुभकर्मों से शत्रु भी प्रसन्न रहते हैं ॥४॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अभीरवः ऊतयः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (तस्मिन्) = उस प्रभु में (हि) = निश्चय से (विश्वाः) = सब (अभीरवः) = हमें भीरुता से ऊपर उठानेवाले-कायरता से दूर करनेवाले (ऊतयः) = रक्षण (सचा) = समवेत (सन्ति) = हैं । सब रक्षण प्रभु के आधार से रहते हैं। प्रभु सब रक्षणों को प्राप्त करानेवाले हैं। [२] (तम्) = उस (पुरूवसुं) = पालक व पूरक वसुओंवाले [ऐश्वर्योंवाले] प्रभु को (सप्तयः) = हमारे ये इन्द्रियाश्व (आवहन्तु) = हमारे लिए प्राप्त कराएँ। ये (हरयः) = इन्द्रियाश्व (सुतम्) = शरीर में उत्पन्न हुए हुए सोम को (मदायः) = हर्ष व उल्लास के लिए [आवहन्तु] = प्राप्त कराएँ। हमारी इन्द्रियाँ बहिर्मुखी न रहकर अन्तर्मुखी हों-हम प्रभु का दर्शन करनेवाले बनें, तथा सोम का रक्षण कर पाएँ। इन्द्रियों की बहिर्मुखता वीर्यरक्षण के अनुकूल नहीं होती।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु द्वारा ही सब रक्षण प्राप्त होते हैं। ये रक्षण ही हमें निडर बनाते हैं। हमारी इन्द्रियाँ अन्तर्मुखवृत्तिवाली होकर हमें प्रभुदर्शन के व सोमरक्षण के योग्य बनाएँ।

शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - सः मर्त्यः=स मनुष्यः। सुनीथः=सुयज्ञः सुनीयमानो वा भवति घेति प्रसिद्धौ। यं मरुतः=सेनाः। अद्रुहः सन्तः। पान्ति=रक्षन्ति। यम्। अर्य्यमा=श्रेष्ठो जनः पाति। मित्रो ब्राह्मणः पाति ॥४॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - In him centre and abide all protections free from fears of the world, integrated. That same lord of world’s wealth and peace, the waves of cosmic energy and vibrations of the mind may, we pray, awaken in our consciousness which is in tune with the lord’s omnipresence for spiritual joy.