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उ॒च॒थ्ये॒३॒॑ वपु॑षि॒ यः स्व॒राळु॒त वा॑यो घृत॒स्नाः । अश्वे॑षितं॒ रजे॑षितं॒ शुने॑षितं॒ प्राज्म॒ तदि॒दं नु तत् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ucathye vapuṣi yaḥ svarāḻ uta vāyo ghṛtasnāḥ | aśveṣitaṁ rajeṣitaṁ śuneṣitam prājma tad idaṁ nu tat ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उ॒च॒थ्ये॑ । वपु॑षि । यः । स्व॒ऽराट् । उ॒त । वा॒यो॒ इति॑ । घृ॒त॒ऽस्नाः । अश्व॑ऽइषितम् । रजः॑ऽइषितम् । शुना॑ऽइषितम् । प्र । अज्म॑ । तत् । इ॒दम् । नु । तत् ॥ ८.४६.२८

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:46» मन्त्र:28 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:6» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:28


शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (वायो) हे सर्वगते, सर्वशक्ते महेश ! आप (नः) हमारे (महे+तने) महान् विस्तार के लिये (मखाय) यज्ञ के लिये (पाजसे) बल के लिये (आ+याहि) हमारे गृह पर हृदय में और शुभकर्मों में आवें, आप (भूरि+दावने) बहुत-बहुत देनेवाले हैं, आप (महि+दावने) महान् वस्तु देनेवाले हैं, हे भगवन् (सद्यः+चित्) सर्वदा (ते) उस आपके लिये (वयम्+हि) हम मनुष्य (चक्रिम) स्तुति करते हैं, आपकी कीर्ति गाते हैं ॥२५॥
भावार्थभाषाः - वह ईश्वर हमारी सम्पूर्ण आवश्यकताएँ जानता और यथाकर्म पूर्ण करता है। उससे बढ़कर कौन दानी है। हे मनुष्यों ! उसी की स्तुति प्रार्थना करो ॥२५॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'अश्वेषितं रजेषितं शुनेषितं' अज्म

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (उचथ्ये) = स्तुति में उत्तम [स्तुत्य] (वपुषि) = शरीर में (यः) = जो (स्वराट्) = स्वयं शासन करनेवाला बनता है। (उत) = और हे (वायो) = गति के द्वारा सब बुराइयों का संहार करनेवाले प्रभो ! जो (घृतस्ना:) = ज्ञान की दीप्ति में स्नान करके अपना शोधन करता है। यही घर को उत्तम बनाता है। [२] (अश्वेषितं) = [अश् व्याप्तौ] सर्वव्यापक प्रभु से प्रापित (रजेषितं) = [रज्] रञ्जनात्मक- आनन्दमय- प्रभु से प्राप्ति तथा (शुनेषितं) = [शुन गतौ ] गतिमय प्रभु से प्रापित (तत्) = वह (इदं) = यह (नु) = निश्चय से (तत् प्र अज्म) = वह प्रकृष्ट गृह है [ अज्म- home ] । प्रभु ने यह शरीररूप गृह प्राप्त कराया है। हमें चाहिए कि हम भी कुछ व्यापक उदारवृत्तिवाले बनें, आनन्दमय स्वभाववाले बनें तथा गतिशील हों। तभी यह शरीरगृह उत्तम बनेगा।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - इस शरीरगृह में हम स्तुति करनेवाले बनें, ज्ञान में अपने को पवित्र करें। उदार प्रसन्न व गतिशील बनकर शरीरगृह को उत्तम बनाएँ। इसके लिए ऐसा कहा जा सके कि -'घर तो यह है। '

शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे वायो=सर्वगते सर्वशक्ते महेश ! त्वम्। नोऽस्माकम्। महे=महते। तने=विस्ताराय। पुनः। मखाय=यज्ञाय। पुनः। पाजसे=बलाय। आयाहि। हि=यस्मान्। वयम्। भूरि=बहु। दावने=दात्रे। महि=महत्। दावने=दात्रे। ते=तुभ्यम्। सद्यश्चित्। चक्रिम=स्तुतिं कुर्मः ॥२५॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Vayu, refulgent ruler of the world of purity, decency and generosity soft as consecrated in ghrta, in this beautiful life of admirable nature and character, whatever you give for social achievement, emotional satisfaction and spiritual realisation is the same as you have given to me.