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आ त॑ ए॒ता व॑चो॒युजा॒ हरी॑ गृभ्णे सु॒मद्र॑था । यदी॑न ब्र॒ह्मभ्य॒ इद्दद॑: ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
ā ta etā vacoyujā harī gṛbhṇe sumadrathā | yad īm brahmabhya id dadaḥ ||
पद पाठ
आ । ते॒ । ए॒ता । व॒चः॒ऽयुजा॑ । हरी॒ इति॑ । गृ॒भ्णे॒ । स॒मत्ऽर॑था । यत् । ई॒म् । ब्र॒ह्मऽभ्यः॑ । इत् । ददः॑ ॥ ८.४५.३९
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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:45» मन्त्र:39
| अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:49» मन्त्र:4
| मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:39
शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - (प्रभुवसो) हे समस्तसम्पत्तिसंयुक्त महेश ! मैं (सख्युः) अपने मित्रगण की (शूनम्) न्यूनता का (मा+आविदे) बोध न करूँ तथा (पुत्रस्य) पुत्र की न्यूनता का बोध (मा) मैं न करूँ, ऐसी कृपा आप करें। (ते+मनः) आपका मन (आवृत्वम्) इस मेरी प्रार्थना की ओर आवे ॥३६॥
भावार्थभाषाः - प्रत्येक आदमी को उतना उद्योग अवश्य करना चाहिये, जिससे कि वह अपने गृह तथा मित्र-वर्ग को सुखी रख सके। अनुद्योगी और आलसी पुरुष ही ईश्वर के राज्य में क्लेश पाते हैं। देखो, निर्बुद्धि परन्तु परिश्रमी पक्षिगण कैसे प्रसन्न रहते हैं ॥३६॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
वचोयुजा हरी
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्रभो! (ते) = आपके (एता) = इन (सुमद्रथा) = शोभन शरीररथवाले इस शोभन रथ में जुतने-वाले (वचोयुजा) = वेदवचनों के अनुसार कार्यों में लानेवाले व रथ में युक्त होनेवाले (हरी) = कर्मेन्द्रिय व ज्ञानेन्द्रियरूप अश्वों को (आगृभ्णे) = ग्रहण करता हूँ। एक सारथि जैसे लगाम से घोड़ों को वशीभूत करता है, उसी प्रकार मैं इन इन्द्रियाश्वों को वश में करता हूँ। [२] (यत्) = क्योंकि (ईम्) = निश्चय से (ब्रह्मभ्यः) = ज्ञानप्राप्ति के लिए [ज्ञान की वाणियों के लिए] व महान् कर्मों के लिए (इत्) = ही (दद:) = आप इन इन्द्रियाश्वों को देते हैं। इन इन्द्रियों को वश में करके ही मैं ज्ञान व महान् कर्मों का सम्पादन कर सकूँगा।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभु से प्रदत्त इन इन्द्रियाश्वों को वश में करके ही ज्ञान व महान् कर्मों का सम्पादन कर सकते हैं।
शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - हे इन्द्र ! मम सख्युः=मित्रस्याहम्। शूनम्=शून्यं न्यूनताम्। मा+आविदे=न जानीयाम्। हे प्रभुवसो=बहुधनम् ! पुत्रस्य। शूनम्। मा+आविदे। ते तव मनः। आवृत्वत्=आवर्त्तताम् ॥३६॥
डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - I receive the word-controlled motive powers and steers of the chariot which fly you on high on liquid fuel, the ones you have given to the scholarly sages.
