वांछित मन्त्र चुनें

उत्ते॑ बृ॒हन्तो॑ अ॒र्चय॑: समिधा॒नस्य॑ दीदिवः । अग्ने॑ शु॒क्रास॑ ईरते ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ut te bṛhanto arcayaḥ samidhānasya dīdivaḥ | agne śukrāsa īrate ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उत् । ते॒ । बृ॒हन्तः॑ । अ॒र्चयः॑ । स॒म्ऽइ॒धा॒नस्य॑ । दी॒दि॒ऽवः॒ । अग्ने॑ । शु॒क्रासः॑ । ई॒र॒ते॒ ॥ ८.४४.४

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:44» मन्त्र:4 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:36» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:4


351 बार पढ़ा गया

शिव शंकर शर्मा

प्रथम इससे अग्निहोत्र का उपदेश देते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यों ! (समिधा) इन्धन और चन्दन आदि सुगन्धित द्रव्यों से (अग्निम्+दुवस्यत) अग्नि की सेवा करो और (अतिथिम्) अतिथिस्वरूप इस अग्नि को (बोधयत) जगाओ और (अस्मिन्) इस अग्नि में (हव्या) हव्य द्रव्यों को (आजुहोतन) होमो ॥१॥
भावार्थभाषाः - भगवान् उपदेश देते हैं कि अग्निहोत्र प्रतिदिन करो। घृत, चन्दन, गुग्गुल, केसर आदि उपकरणों से शाकल्य तैयार कर सुशोभन कुण्ड बना उसमें अग्नि प्रदीप्त कर होमो ॥१॥
351 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'बृहन्तः शुक्रासः ' अर्चयः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (दीदिवः) = प्रकाशमय प्रभो ! (समिधानस्य) = हृदय देश में समिद्ध किये जाते हुए (ते) = आपके (बृहन्तः) = वृद्धि की कारणभूत (अर्चयः) = ज्ञानज्वालाएँ (उद् ईरते) = उद्गत होती है। हृदय में प्रभु का ध्यान करने पर हृदय ज्ञानज्वालाओं से उज्ज्वल हो उठता है। [२] हे (अग्ने) = अग्रणी प्रभो ! आपके उपासन से (शुक्रासः) = चमकती हुई ज्ञानदीप्तियाँ उद्गत होती हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हृदय में प्रभु का ध्यान हृदय को ज्ञानदीप्तियों से उज्ज्वल कर देता है।
351 बार पढ़ा गया

शिव शंकर शर्मा

प्रथममग्निहोत्रमुपदिशत्यनया।

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्याः ! समिधा। अतिथिमग्निम्। दुवस्यत=परिचरत सेवध्वम्। घृतैश्च। इमम्। बोधयत=जागरयत। अस्मिन्नग्नौ। हव्या=हव्यानि=हवींषि। आजुहोतन=आजुहुत च ॥१॥
351 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, lord of light and fire, kindled, fed and rising, your lofty and expansive flames, shining and blazing, pure, powerful and purifying, go on rising higher and higher.