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अद॑ब्धस्य स्व॒धाव॑तो दू॒तस्य॒ रेभ॑त॒: सदा॑ । अ॒ग्नेः स॒ख्यं वृ॑णीमहे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

adabdhasya svadhāvato dūtasya rebhataḥ sadā | agneḥ sakhyaṁ vṛṇīmahe ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अद॑ब्धस्य । स्व॒धाऽव॑तः । दू॒तस्य॑ । रेभ॑तः । सदा॑ । अ॒ग्नेः । स॒ख्यम् । वृ॒णी॒म॒हे॒ ॥ ८.४४.२०

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:44» मन्त्र:20 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:39» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:20


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे सर्वशक्ति सर्वगतिप्रद ईश ! (तव) तेरी (अर्चयः) सूर्य्यादिरूप ज्वालाएँ (उद्+ईरते) ऊपर फैलती हैं, जो (शुचयः) परम पवित्र हैं (शुक्राः) शुक्ल हैं (भ्राजन्तः) सर्वत्र दीप्यमान हो रही हैं। हे भगवन् ! (तव+ज्योतींषि) आपके तेज सर्वत्र फैल रहे हैं ॥१७॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्यों ! ईश्वर का तेज देखो। सूर्य्य उसकी ज्वाला है। तुम स्वयं उसके ज्योति हो। जिसमें सर्वज्ञान भरा हुआ है, वह मानवजाति किस प्रकार भटक रही है ॥१७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु की मित्रता में

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हम (अग्नेः) = उस अग्रणी प्रभु की (सख्यं) = मित्रता को (वृणीमहे) = वरते हैं। प्रभु की मित्रता ही वास्तविक मित्रता है। [२] उस प्रभु की मित्रता को हम (सदा) = सदा वरते हैं जो (अदब्धस्य) = अहिंसित हैं, (स्वधावतः) = आत्म धारणशक्तिवाले हैं-किसी अन्य से प्रभु का धारण नहीं होता, (दूतस्य) = जो ज्ञान का सन्देश प्राप्त करानेवाले हैं तथा (रेभतः) = ' ऋग्, यजु, साम' रूप तीनों वाणियों का उच्चारण करनेवाले हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभु की मित्रता का वरण करें। इस मित्रता से हम काम-क्रोध आदि से हिंसित न होंगे, अपना धारण स्वयं कर पाएँगे, तथा प्रभु के ज्ञान-सन्देश को सुन पाएँगे। हमारा जीवन 'ज्ञान-कर्म-उपासना' से युक्त होगा।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - अग्ने ! तव। शुचयः=शुद्धाः। शुक्राः=शुक्लवर्णाः। तथा भ्राजन्तो दीप्यमानाः। अर्चयः। उदीरते=ऊर्ध्वं गच्छन्ति। हे भगवन् ! तव तेजांसि सर्वत्र प्रसरन्ति ॥१७॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - We choose, claim and pray for the love and friendship of Agni, indestructible and benevolent, inherently powerful, bearer and dispenser of energy, light and wisdom, and omniscient lord of speech.