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अग्ने॒ स्तोमं॑ जुषस्व मे॒ वर्ध॑स्वा॒नेन॒ मन्म॑ना । प्रति॑ सू॒क्तानि॑ हर्य नः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

agne stomaṁ juṣasva me vardhasvānena manmanā | prati sūktāni harya naḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अग्ने॑ । स्तोम॑म् । जु॒ष॒स्व॒ । मे॒ । वर्ध॑स्व । अ॒नेन॑ । मन्म॑ना । प्रति॑ । सु॒ऽउ॒क्तानि॑ । ह॒र्य॒ । नः॒ ॥ ८.४४.२

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:44» मन्त्र:2 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:36» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:2


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे सर्वाधार ईश ! (विभावसुः) जिस कारण आप सबको अपने तेज से प्रकाशित करनेवाले हैं (शर्धन्) और समर्थ हैं, अतः (सः+त्वम्) वह आप (न) जैसे (रश्मिभिः) किरणों से (सृजन्) उदित होता हुआ सूर्य्य अन्धकारों को दूर करता है, तद्वत् (तमांसि) हमारे निखिल अज्ञानों को (जिघ्नसे) दूर कीजिये ॥३२॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा के ध्यान और पूजन से अन्तःकरण उज्ज्वल होता जाता है और वह उपासक दिन-२ पाप से छूटता जाता है ॥–३२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

' स्तोम - मन्म- सूक्त'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अग्ने) = परमात्मन्! (मे) = मेरे से किये जानेवाले (स्तोमं) = स्तुतिसमूह को (जुषस्व) = प्रीतिपूर्वक सेवन करिये। मेरे से किये जानेवाले ये स्तुतिसमूह मुझे आपका प्रिय बनाएँ। (अनेन) = इस (मन्मना) = ज्ञानपूर्वक उच्चरित स्तोम से (वर्धस्व) = आप मेरे अन्दर बढ़िये । आपके लिए उच्चरित ये 'मन्म' मेरे में आपके भावों को बढ़ानेवाले हों। ये मन्म दिव्यता के वर्धन का कारण बनें। [२] (नः) = हमारे सूक्तानि सूक्तों को उत्तम गुण प्रतिपादक वचनों को (प्रतिहर्य) = आप प्रतिदिन चाहें - आपके लिए ये सूक्त इष्ट हों।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम 'साम' द्वारा प्रभु के स्तोमों का उच्चारण करें। यजुर्मन्त्रों द्वारा प्रभु के मन्मों को करनेवाले बनें और ऋचाओं द्वारा सूक्तों का उच्चारण करें।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे अग्ने ! विभावसुः=सर्वेषां भासयिता तथा शर्धन्=समर्थोऽसि। स त्वम्। सृजन्=उद्यन्। सूर्य्यो न=सूर्य्य इव। रश्मिभिः। यथा किरणैः उद्यन् सूर्य्यः। तथा शर्धन्=समर्थस्त्वम्। तमांसि=अज्ञानानि। जिघ्नसे=जहि ॥३२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Divine Agni, leading light of life, accept my adoration and rise, by this conscientious eulogy, listen in response to our songs, grow higher and let us rise and grow higher too.