ए॒ते त्ये वृथ॑ग॒ग्नय॑ इ॒द्धास॒: सम॑दृक्षत । उ॒षसा॑मिव के॒तव॑: ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
ete tye vṛthag agnaya iddhāsaḥ sam adṛkṣata | uṣasām iva ketavaḥ ||
पद पाठ
ए॒ते । त्ये । वृथ॑क् । अ॒ग्नयः॑ । इ॒द्धासः॑ । सम् । अ॒दृ॒क्ष॒त॒ । उ॒षसा॑म्ऽइव । के॒तवः॑ ॥ ८.४३.५
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:43» मन्त्र:5
| अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:29» मन्त्र:5
| मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:5
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शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - (जातवेदः) हे सर्वज्ञ हे सर्वधन हे सर्वज्ञानबीजप्रद (विचर्षणे) हे सर्वदर्शिन् (अग्ने) सर्वव्यापिन् भगवन् ! (प्रतिहर्षते) निखिल कामनाओं को देते हुए और उपासकों के कल्याणाभिलाषी (अस्मै+ते) इस आपके लिये मैं (सुष्टुतिम्) अच्छी स्तुति (जनामि) जनाता हूँ, हे भगवन् आप इसे ग्रहण करें ॥२॥
भावार्थभाषाः - भगवान् स्वयं सर्वज्ञ और सर्वज्ञानमय है। उसी की स्तुति हम लोग अपने कल्याण के लिये करें। वह परमदेव इतना अवश्य चाहता है कि समस्त प्राणी मेरी आज्ञा पर चलें ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
उषसाम् केतवः इव
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (एते) = ये (त्ये) = वे प्रसिद्ध (अग्नयः) = यज्ञाग्नियाँ (वृथक्) = पृथक्-पृथक् स्थानों में (इद्धास:) = समिद्ध हुई - हुई (समदृक्षत) = दिखती हैं। (सर्वत्र) = सब घरों में यज्ञाग्नियाँ दीप्त हो रही हैं। [२] ये यज्ञाग्नियाँ (उषसां) = उषाकालों की (केवतः इव) = पताकाएँ सी हैं उषाकालों की यह प्रज्ञापक हैं, सूचना देनेवाली हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ:- उषाकालों में सर्वत्र होते हुए यज्ञ अग्नियों द्वारा उषा का प्रज्ञापन कर रहे हैं।
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शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - हे जातवेदः=जातं जातं यो वेत्ति स जातवेदाः। यद्वा यस्मान् निखिलानि जातांसि धनानि जातानि स जातवेदाः। यद्वा। सर्वाणि विज्ञानानि जातानि यस्मात् तत्सम्बोधने हे जातवेदः ! हे विचर्षणे=सर्वेषां द्रष्टः। अग्ने=सर्वत्र व्यापकदेव ! हे भगवन् ! प्रतिहर्य्यते=प्रतिप्रयच्छते=जीवेभ्यः सर्वं ददते। यद्वा। प्रतिहर्य्यते=उपासकानां कल्याणं कामयमानाय। अस्मै ते। सुष्टुतिम्=शोभनां स्तुतिम्। जनामि=जनयामि। हे भगवन् ! तां त्वं गृहाण ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - All these versions of Agni, lit up, shining, blazing, all in their own way, appear beautiful as ensigns of dawns, lights and glories of Agni.
