तुभ्यं॒ घेत्ते जना॑ इ॒मे विश्वा॑: सुक्षि॒तय॒: पृथ॑क् । धा॒सिं हि॑न्व॒न्त्यत्त॑वे ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
tubhyaṁ ghet te janā ime viśvāḥ sukṣitayaḥ pṛthak | dhāsiṁ hinvanty attave ||
पद पाठ
तुभ्य॑म् । घ॒ । इत् । ते । जनाः॑ । इ॒मे । विश्वाः॑ । सु॒ऽक्षि॒तयः॑ । पृथ॑क् । धा॒सिम् । हि॒न्व॒न्ति॒ । अत्त॑वे ॥ ८.४३.२९
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:43» मन्त्र:29
| अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:34» मन्त्र:4
| मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:29
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शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे सर्वशक्ते सर्वाधार देव ! तू (मृध्राणि) हिंसक (द्विषः) द्वेषी पुरुषों को (अप+घ्नन्) विनष्ट करता हुआ और (विश्वाहा) सब दिन (रक्षांसि) महामहा दुष्ट अत्याचारी अन्यायी घोर पापी जनों को (तिग्मेन) तीक्ष्ण तेज से (दहन्) जलाता हुआ (दीदिहि) इस भूमि को उज्ज्वल बना ॥२६॥
भावार्थभाषाः - उसकी कृपा से मनुष्यों के निखिल विघ्न शान्त होते हैं, अतः हे मनुष्यों ! उसी की उपासना करो ॥२६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
अत्तवे धासिं हिन्वन्ति
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (इमे) = ये (ते) = वे (विश्वाः) = सब (सुक्षितयः) = उत्तम निवास व गतिवाले (जनाः) = मनुष्य (घा इत्) = निश्चय से (तुभ्यं) = आपकी प्राप्ति के लिए ही (अत्तवे) = खाने के लिए (पृथक्) = अलग-अलग (धासिं) = धारणात्मक भोजन को (हिन्वन्ति) = प्रेरित करते हैं । [२] प्रभु प्राप्ति के लिए शरीर को स्वस्थ रखना भी आवश्यक है। शरीर के स्वास्थ्य के लिए धारणात्मक भोजन का ही करना ठीक है। यह भोजन शरीरों की प्रकृति के पार्थक्य के कारण पृथक्-पृथक् ही होगा। यह ठीक है कि भोजन का भी उद्देश्य शरीर के स्वास्थ्य के द्वारा प्रभु प्राप्ति के मार्ग पर बढ़ना ही होना चाहिए।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - उत्तम निवासवाले लोग भोजन को भी प्रभु प्राप्ति के उद्देश्य से शरीर को स्वस्थ रखने के लिए करते हैं।
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शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - हे अग्ने ! मृध्राणि=हिंसकान्। द्विषः=द्वेष्टॄन्। अपघ्नन्=अपविनाशयन्। पुनः। विश्वाहा=सर्वाणि अहानि। रक्षांसि=महादुष्टान्। तिग्मेन=तीव्रेण तेजसा। दहन् त्वम्। दीदिहि। दीपय ॥२६॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Those people far away and all these people settled here, all in their own ways, offer you homage as their haven and home for the gift of their own food and sustenance.
