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अस्मै॑ ते प्रति॒हर्य॑ते॒ जात॑वेदो॒ विच॑र्षणे । अग्ने॒ जना॑मि सुष्टु॒तिम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

asmai te pratiharyate jātavedo vicarṣaṇe | agne janāmi suṣṭutim ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अस्मै॑ । ते॒ । प्र॒ति॒ऽहर्य॑ते । जात॑ऽवेदः । विऽच॑र्षणे । अग्ने॑ । जना॑मि । सु॒ऽस्तु॒तिम् ॥ ८.४३.२

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:43» मन्त्र:2 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:29» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:2


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (नासत्या) हे असत्यरहित (अश्विना) अश्वयुक्त राजवर्ग ! (अत्रिः) रक्षारहित (विप्रः) मेधावी (यथा) जैसे (वाम्) आपको (सोमपीतये) समस्त पदार्थों की रक्षा के लिये (अजोहवीत्) बुलाते हैं, तद्वत् अन्य भी आपको बुलाया करें, जिससे (समे) समस्त (अन्यके+नभन्ताम्) शत्रु और विघ्न नष्ट होवें ॥५॥
भावार्थभाषाः - राजा और राज्य-कर्मचारियों को उचित है कि विद्वान्, मूर्ख, धनी, गरीब और असहाय आदि सर्व प्रकार के मनुष्यों की पूरी रक्षा करें, जिससे कोई विघ्न न रहने पावे ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'जातवेदा विचर्षणि अग्नि' प्रभु

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (जातवेदः) = सम्पूर्ण धनों का प्रादुर्भाव करनेवाले, (विचर्षणे) = विद्रष्टः प्रभो ! सबका ध्यान करनेवाले (अग्ने) = अग्रणी प्रभो ! (अस्मै) = इस (प्रतिहर्यते) = प्रत्येक प्राणी के हित की कामनावाले (ते) = आपके लिए (सुष्टुतिम्) = उत्तम स्तुति को (जनामि) = उत्पन्न करता हूँ। [२] प्रभु का स्तवन करता हुआ मैं आवश्यक धनों को प्राप्त करता हूँ- ज्ञान को प्राप्त करके - विचर्षणि बनकर- मैं आगे और आगे बढ़ता हूँ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ:- प्रभु-स्तवन करते हुए हम 'धन+ज्ञान व उन्नति' को प्राप्त करें।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे नासत्या=नासत्यौ। अश्विना=अश्विनौ। ! अत्रिः=अत्रः= त्राणरहितः। विप्रः=मेधावी। गीर्भिः=स्ववचनैः। यथा। वां=युवाम्। सोमपीतये। अजोहवीत्=आह्वयति। तथा अन्येऽपि युवाम्। आह्वयन्तु। येन। समे। अन्यके=अन्ये। नभन्ताम्=नश्यन्तु ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - This holy song of worship, Agni, all-knowing, all pervasive lord of light, vision, and love, I raise to you, hoping your grace would accept and respond.