वांछित मन्त्र चुनें

उ॒क्षान्ना॑य व॒शान्ना॑य॒ सोम॑पृष्ठाय वे॒धसे॑ । स्तोमै॑र्विधेमा॒ग्नये॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ukṣānnāya vaśānnāya somapṛṣṭhāya vedhase | stomair vidhemāgnaye ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उ॒क्षऽअ॑न्नाय । व॒शाऽअ॑न्नाय । सोम॑ऽपृष्ठाय । वे॒धसे॑ । स्तोमैः॑ । वि॒धे॒म॒ । अ॒ग्नये॑ ॥ ८.४३.११

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:43» मन्त्र:11 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:31» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:11


740 बार पढ़ा गया

शिव शंकर शर्मा

फिर उसी विषय को कहते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्निः) यह भौतिक अग्नि (जिह्वाभिः+अह) अपनी ज्वालाओं से ही (नन्नमद्) समस्त वनस्पतियों को नम्र करता हुआ और (अर्चिषा) तेज से (जञ्जणाभवन्) जलता हुआ (वनेषु) वनों में (रोचते) प्रकाशित हो रहा है ॥८॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्यों ! प्रथम भौतिक अग्नि के गुणों का पठन-पाठन करो। देखो, कैसी तीक्ष्ण इसकी गति है और इससे कौन-२ कार्य्य हो रहे हैं ॥८॥
740 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

उक्षान्न+वशान्न [यज्ञाग्नि]

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (वेधसे) = सब इष्ट कामनाओं को पूर्ण करनेवाले [इष्ट कामघुक्] (अग्नये) = यज्ञाग्नि के लिए (स्तोमैः) = स्तुति मन्त्रों के साथ (विधेम)= पूजन करें। अग्नि का पूजन यही है कि इसमें उत्तम ओषधियों व घृत की आहुति दी जाए। ये सब औषध द्रव्य सूक्ष्मरूप में होकर वायुमण्डल को रोगकृमिशून्य करते हैं और श्वासवायु के साथ शरीर में जाकर हमें नीरोग बनाते हैं। [२] उस अग्नि का हम पूजन करते हैं जो (उक्षान्नाय) = 'उक्षां नामक' ओषधिरूप अन्नवाला है। इसी प्रकार (वशान्नाय) = वश्य अर्थात् पृथिवी से उत्पन्न ओषधियाँ जिसके अन्न हैं और (सोमपृष्ठाय) = कर्पूर जिसका आधार बनता है। कर्पूर द्वारा जो प्रज्ज्वलित की जाती है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ:- कर्पूर द्वारा इसे प्रज्ज्वलित करें। इस प्रकार यह अग्निहोत्र हमारी इष्टकामनाओं को पूर्ण करेगा।
740 बार पढ़ा गया

शिव शंकर शर्मा

पुनस्तमेवार्थमाह।

पदार्थान्वयभाषाः - अग्निः। जिह्वाभिरह=जिह्वाभिरेव=स्वकीयज्वालाभिरेव। सर्वान् वनस्पतीन्। नन्नमद्=अत्यन्तं नमयन्। अर्चिषा=तेजसा। जञ्जणाभवन्=ज्वलन्। “जञ्जणाभवन् मल्मलाभवन्निति ज्वलतिकर्मसु पाठः”। वनेषु। रोचते=प्रकाशते ॥८॥
740 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - With songs of adoration, let us offer honour and worship to Agni and develop the science of fire and energy which provides life and sustenance to the cow and the sun and all dependent forms of life in existence and bears and brings the soma of health and joy for all.