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आ वां॒ ग्रावा॑णो अश्विना धी॒भिर्विप्रा॑ अचुच्यवुः । नास॑त्या॒ सोम॑पीतये॒ नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā vāṁ grāvāṇo aśvinā dhībhir viprā acucyavuḥ | nāsatyā somapītaye nabhantām anyake same ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ । वा॒म् । ग्रावा॑णः । अ॒श्वि॒ना॒ । धी॒भिः । विप्राः॑ । अ॒चु॒च्य॒वुः॒ । नास॑त्या । सोम॑ऽपीतये । नभ॑न्ताम् । अ॒न्य॒के । स॒मे॒ ॥ ८.४२.४

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:42» मन्त्र:4 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:28» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:4


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (असुरः) सबमें प्राण देनेवाला (विश्ववेदाः) सर्व धन और सर्व ज्ञानमय वह वरुण-वाच्य जगदीश्वर (द्याम्) पृथिवी से ऊपर समस्त जगत् को (अस्तभ्नात्) स्तम्भ के समान पकड़े हुए विद्यमान है, पुनः (पृथिव्याः+वरिमाणम्) पृथिवी के परिमाण को (अमिमीत) जो बनाता है और जो (विश्वा+भुवनानि) सम्पूर्ण भुवनों को बनाकर (आसीदत्) उन पर अधिकार रखता है (सम्राड्) वही सबका महाराज है। हे मनुष्यों ! (वरुणस्य) वरणीय परमात्मा के (व्रतानि) कर्म (तानि) वे ये (विश्वा+इत्) सब ही हैं। कहाँ तक उसका वर्णन किया जाए, इसकी यह शक्ति जानकर इसी को गाओ और पूजो ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ग्रावाणः + विप्रः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अश्विना) = प्राणापानो! (वां) = आपकी (ग्रावाणः) = स्तुति की वाणियों का उच्चारण करनेवाले (विप्राः) = ज्ञानी लोग (धीभिः) = ज्ञानपूर्वक किये जानेवाले कर्मों के हेतु से (आ अचुच्यवुः) = सर्वथा प्राप्त होते हैं, आपकी ओर आते हैं। प्राणापान की साधना ही वस्तुतः हमें 'ग्रावा व विप्र' बनाती है। इस साधना से ही हम ज्ञानपूर्वक किये जानेवाले यज्ञादि कर्मों में प्रवृत्त होते हैं। [२] हे (नासत्या) = सब असत्यों को दूर करनेवाले प्राणापानो! आप (सोमपीतये) = शरीर में सोम के पान के लिए होते हो। आपके द्वारा ही शरीर में सोम का रक्षण होता है। इस सोमरक्षण के होने पर (समे) = सब (अन्यके) = शत्रु (नभन्ताम्) = नष्ट हो जाएँ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम स्तुति व ज्ञान में प्रवृत्त हुए हुए प्राणसाधना को करनेवाले बनें। यह साधना शरीर में सोम का रक्षण करती हुई हमारे काम-क्रोध-लोभ आदि शत्रुओं का विनाश करती है।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - असुरः=असून् प्राणान् राति ददातीत्यसुरः। विश्ववेदाः=विश्वानि सर्वाणि वेदांसि धनानि ज्ञानानि वा यस्य स विश्ववेदाः। वरुणः द्याम्। अस्तभ्नात्=स्तम्भवत् धारयति। पुनः पृथिव्याः। वरिमाणं परिमाणम्। अमिमीत=विरचयति। पुनः विश्वा=विश्वानि=सर्वाणि भुवनानि सृष्ट्वा। आसीदत्=अधितिष्ठति। तथा तेषां सम्राडपि स एव। हे मनुष्याः ! वरुणस्य। तान्येतानि व्रतानि। विश्वा+इत्=विश्वान्येव। सर्वाणि तस्यैव कार्य्याणीति ज्ञात्वा तमेव गायत पूजयत ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ashvins, complementary powers of vision and action, teacher and ruler, dedicated to truth and truth alone, to you repair the scholar and the maker of soma with their intelligence, will and wisdom so that they may have a taste of the soma of knowledge and wisdom, and piety. May all fears insecurities and enmities be eliminated.