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स चि॑केत॒ सही॑यसा॒ग्निश्चि॒त्रेण॒ कर्म॑णा । स होता॒ शश्व॑तीनां॒ दक्षि॑णाभिर॒भीवृ॑त इ॒नोति॑ च प्रती॒व्यं१॒॑ नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sa ciketa sahīyasāgniś citreṇa karmaṇā | sa hotā śaśvatīnāṁ dakṣiṇābhir abhīvṛta inoti ca pratīvyaṁ nabhantām anyake same ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सः । चि॒के॒त॒ । सही॑यसा । अ॒ग्निः । चि॒त्रेण॑ । कर्म॑णा । सः । होता॑ । शश्व॑तीनाम् । दक्षि॑णाभिः । अ॒भिऽवृ॑तः । इ॒नोति॑ । च॒ । प्र॒ती॒व्य॑म् । नभ॑न्ताम् । अ॒न्य॒के । स॒मे॒ ॥ ८.३९.५

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:39» मन्त्र:5 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:22» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:5


शिव शंकर शर्मा

शत्रु के विनाश के लिये प्रार्थना।

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे सर्वशक्तिमन् ईश ! (एषाम्) इन हम लोगों के (तनूषु) शरीर में (शंसम्) प्रशंसनीय (वचः) वचन को (नव्यसा) नूतन वचन के साथ बढ़ा। (रराव्णम्) दाताओं के (विश्वाः+अरातीः) सर्व शत्रुओं को (नि) दूर कीजिये। पुनः (इतः) इस संस्था से (आमूरः) मूर्ख (अरातीः) और अदाता (अर्य्यः) शत्रुगण (युच्छन्तु) यहाँ से दूर चले जाएँ। शेष पूर्ववत् ॥२॥
भावार्थभाषाः - हम लोग प्राचीन भाषा और नवीन भाषा दोनों की उन्नति करें और अनाथादिकों को सदा दान किया करें, जो न देवें, उन्हें शिक्षा देकर दानपथ पर लावें ॥२॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

शत्रुविनाश व दिव्यगुण प्राप्ति

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (स:) = वे (अग्निः) = प्रभु (सहीयसा) = शत्रुओं को अभिभूत करनेवाले (चित्रेण कर्मणा) = अद्भुत कर्म से (चिकेत) = जाने जाते हैं। प्रभु अपने उपासकों के शत्रुओं का विनाश करते हैं । (सः) = वे प्रभु (शश्वतीनां होता) = [नि०- ३.१ 'बहु' शश्वत्] बहुत दिव्यभावनाओं के होता - [आह्वाता] पुकारनेवाले हैं, अर्थात् प्रभु के अनुग्रह से स्तोता के जीवन में दिव्यभावनाओं का वर्धन होता है। [२] वे प्रभु (दक्षिणाभिः) = दक्षिणाओं से (अभीवृतः) = परिवृत हैं, अर्थात् सब देय पदार्थों को स्तोता को प्राप्त कराने के लिए उद्यत हैं, (च) = और (प्रतीव्यम्) = [प्रत्येतव्यम्] आक्रमण करने योग्य शत्रु को (इनोति) = आक्रान्त करते हैं- उस पर आक्रमण के लिए जाते हैं। प्रभु के अनुग्रह से (समे) = सब (अन्यके) = शत्रु (नभन्ताम्) = नष्ट हो जाएँ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु हमारे काम-क्रोध आदि शत्रुओं को नष्ट करके दिव्य भावों को प्राप्त कराते हैं। हमारे लिए सब आवश्यक पदार्थों को देते हैं और हमारे शत्रुओं को आक्रान्त करते हैं।

शिव शंकर शर्मा

शत्रुविनाशाय प्रार्थना।

पदार्थान्वयभाषाः - हे अग्ने=सर्वशक्ते ! एषाम्=अस्माकम्। तनूषु=शरीरेषु। शंसम्=प्रशंसनीयम्। वचः। नव्यसा=नवतरेण वचसा सह। नि=नितराम्। वर्धय। रराव्णम्=दातॄणामस्माकम्। विश्वाः=सर्वाः। अरातीः=शत्रून्। निदह। पुनः। इतः स्थानात्। आमुरः=आमूढाः। अरातीः=अरातारः=अदातारः। अर्य्यः=अरयः शत्रवः। युच्छन्तु=गच्छन्तु। शेषं पूर्ववत् ॥२॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni is known by his powerful and marvellous actions. He is the initiator and original high-priest of the eternal yajnas of the cycles of creation. Self- provided, generosity incarnate, universally chosen and adored, he comes to bless whoever reposes faith in him with prayer. May all negativities and adversities vanish.