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अग्ने॒ मन्मा॑नि॒ तुभ्यं॒ कं घृ॒तं न जु॑ह्व आ॒सनि॑ । स दे॒वेषु॒ प्र चि॑किद्धि॒ त्वं ह्यसि॑ पू॒र्व्यः शि॒वो दू॒तो वि॒वस्व॑तो॒ नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

agne manmāni tubhyaṁ kaṁ ghṛtaṁ na juhva āsani | sa deveṣu pra cikiddhi tvaṁ hy asi pūrvyaḥ śivo dūto vivasvato nabhantām anyake same ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अग्ने॑ । मन्मा॑नि । तुभ्य॑म् । कम् । घृ॒तम् । न । जु॒ह्वे॒ । आ॒सनि॑ । सः । दे॒वेषु॑ । प्र । चि॒कि॒द्धि॒ । त्वम् । हि । असि॑ । पू॒र्व्यः । शि॒वः । दू॒तः । वि॒वस्व॑तः । नभ॑न्ताम् । अ॒न्य॒के । स॒मे॒ ॥ ८.३९.३

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:39» मन्त्र:3 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:22» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:3


शिव शंकर शर्मा

विद्वान् राजा और दूत आदरणीय हैं, यह विषय कहते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (याभ्याम्) जिन इन्द्र और अग्नि अर्थात् राजा और राजदूत के लिये (गायत्रम्+ऋच्यते) गायत्र नाम का साम कहा जाता है, उन (सरस्वतीवतोः) विद्यापूर्ण (इन्द्राग्न्योः) राजा और दूत के निकट (अवः+अहम्+वृणे) रक्षा और साहाय्य की याचना मैं करता हूँ ॥१०॥
भावार्थभाषाः - प्रजाजन राजा के निकट साहाय्यार्थ याचना करे ॥१०॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

घृतं मन्मानि

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अग्ने) = परमात्मन् ! (तुभ्यं) = आपकी प्राप्ति के लिए मैं (आसनि) = मुख में (कं घृतं) = सुखकर ज्ञानदीप्ति को [घृ दीप्तौ] तथा (मन्मानि) = स्तोत्रों को (जुवे) = आहुत करता हूँ, अर्थात् मेरा मुख ज्ञान की वाणियों को तथा स्तुतिवचनों को ही उच्चारित करनेवाला बनता है । [२] (स त्वं) = वे आप (देवेषु प्रचिकिद्धि) = सूर्य आदि सब देवों के विषय में हमें ज्ञानयुक्त कीजिए । (त्वं हि) = आप ही (पूर्व्यः असि) = सृष्टि के प्रारम्भ में होनेवाले हैं। उस समय आप ही तो ज्ञान देनेवाले हैं। आप (शिवः) = कल्याण करनेवाले हैं तथा (विवस्वतः दूतः) = विवस्वान् के दूत हैं- जो भी ज्ञान के सूर्य हैं उनके लिए भी ज्ञान के सन्देश को देनेवाले हैं। इस ज्ञान के होने पर (समे) = सब अन्यके शत्रु (नभन्ताम्) = विनष्ट हों ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ:- प्रभुप्राप्ति के लिए हम ज्ञान व स्तवन की ओर झुकते हैं। प्रभु ही हमें सब सूर्य आदि देवों के विषय में ज्ञान देते हैं। ज्ञान देकर प्रभु हमारा कल्याण करते हैं।

शिव शंकर शर्मा

विद्वांसौ राजदूतावादरणीयौ।

पदार्थान्वयभाषाः - याभ्यामिन्द्राग्नीभ्याम्। गायत्रं साम। ऋच्यते=स्तूयते। तयोः। सरस्वतीवतोः=विद्यावतोः इन्द्राग्न्योः अवः=रक्षणम्। अहमावृणै=याचे ॥१०॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, lord of yajna, as I offer charming oblations of ghrta into the fire I offer hymns of adorations to you. Pray know and accept these among and with other divinities. You are the oldest, eternal and gracious messenger of the sun. May all negativities and adversities vanish.