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त्वं नो॑ अग्न आ॒युषु॒ त्वं दे॒वेषु॑ पूर्व्य॒ वस्व॒ एक॑ इरज्यसि । त्वामाप॑: परि॒स्रुत॒: परि॑ यन्ति॒ स्वसे॑तवो॒ नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tvaṁ no agna āyuṣu tvaṁ deveṣu pūrvya vasva eka irajyasi | tvām āpaḥ parisrutaḥ pari yanti svasetavo nabhantām anyake same ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

त्वम् । नः॒ । अ॒ग्ने॒ । आ॒युषु॑ । त्वम् । दे॒वेषु॑ । पू॒र्व्य॒ । वस्वः॑ । एकः॑ । इ॒र॒ज्य॒सि॒ । त्वाम् । आपः॑ । प॒रि॒ऽस्रुतः॑ । परि॑ । य॒न्ति॒ । स्वऽसे॑तवः । नभ॑न्ताम् । अ॒न्य॒के । स॒मे॒ ॥ ८.३९.१०

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:39» मन्त्र:10 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:23» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:10


शिव शंकर शर्मा

पुनः उसी अर्थ को कहते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्निः+देवेषु) वह परमात्मा सब देवों के मध्य निवास करनेवाला है (आ) और (सः+यज्ञियासु+विक्षु) यज्ञार्ह पवित्र प्रजाओं में भी निवास करनेवाला है, (सः+मुदा) वह हर्ष से (पुरु+काव्या) उपासकों के बहुत स्तोत्रादि काव्यों को (पुष्यति) पुष्ट करता है और (भूम+इव) पृथिवी के समान ही (विश्वम्+पुष्यति) सबको पुष्ट करता है। (देवेषु+यज्ञियः+देवः) वह सूर्य्यादि देवों में पूज्य देव है, अतः वही एक पूज्य है। शेष पूर्ववत् ॥७॥
भावार्थभाषाः - सब देवों में वही एक परमपूज्य है। हे मनुष्यो ! उसी की स्तुति प्रार्थना करो, अन्य की नहीं ॥७॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

परिस्स्रुतः स्वसेतवः आपः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (पूर्व्य) = सर्वप्रथम स्थान में स्थित अथवा पालन व पूरण करनेवालों में उत्तम (अग्ने) = अग्रणी प्रभो ! (त्वं) = आप (आयुषु) = मनुष्यों में (नः) = हमारे (वस्वः) = धनों के (एकः इरज्यसि) = अद्वितीय ईश्वर हैं, सब धनों के स्वामी आप ही हैं। (देवेषु) = सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र आदि देवों में भी विद्यमान वसु के (त्वं) = आप ही (इरज्यसि) = ईश हैं। [२] (त्वाम्) = आपको (आपः) = वे प्रजाएँ (परियन्ति) = सर्वथा प्राप्त होती हैं जो (परिस्स्रुतः) = [परि- स्रु] समन्तात् अपने कर्तव्यकर्मों में गतिवाली हैं तथा (स्वसेतवः) = स्वयं अपने को व्रतों के बन्धन में बाँधनेवाली हैं। हे प्रभो! आपके अनुग्रह से (समे) = सब (अन्यकेः) = काम, क्रोध, लोभ आदि शत्रु (नभन्ताम्) = नष्ट हो जाएँ ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु ही मनुष्यों व देवों में होनेवाले सब ऐश्वर्यों के स्वामी है। प्रभु को कर्तव्यपालक व्रती पुरुष प्राप्त होते हैं। अगले सूक्त में देवता 'इन्द्राग्नी' हैं-

शिव शंकर शर्मा

पुनस्तमर्थमाह।

पदार्थान्वयभाषाः - देवेषु। अग्निः। संवसुः=सम्यग् वसतीति संवसुः। आ=पुनः। यज्ञियासु=यज्ञार्हासु। विक्षु=प्रजासु च। सः संवसुः। समुदा=आनन्देन=उपासकानाम्। पुरु=पुरूणि। काव्या= काव्यानि स्तोत्रादीनि। भूमेव=पृथिवीमिव। विश्वम्=सर्वञ्च। पुष्यति। स देवेषु। यज्ञदेवोऽस्ति। नभन्तामिति पूर्ववत् ॥७॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, ancient and eternal power of existence, you alone among humanity and among divinities rule the entire wealth and power of existence. All around you the dynamic energies of life unfold and flow by themselves, provide vitality of life as messengers of Agni to forms of existence, and ultimately merge with you. May all negativities, adversities and contradictions vanish from our life for all time.