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क्ष॒त्रं जि॑न्वतमु॒त जि॑न्वतं॒ नॄन्ह॒तं रक्षां॑सि॒ सेध॑त॒ममी॑वाः । स॒जोष॑सा उ॒षसा॒ सूर्ये॑ण च॒ सोमं॑ सुन्व॒तो अ॑श्विना ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

kṣatraṁ jinvatam uta jinvataṁ nṝn hataṁ rakṣāṁsi sedhatam amīvāḥ | sajoṣasā uṣasā sūryeṇa ca somaṁ sunvato aśvinā ||

पद पाठ

क्ष॒त्रम् । जि॒न्व॒त॒म् । उ॒त । जि॒न्व॒त॒म् । नॄन् । ह॒तम् । रक्षां॑सि । सेध॑तम् । अमी॑वाः । स॒ऽजोष॑सौ । उ॒षसा॑ । सूर्ये॑ण । च॒ । सोम॑म् । पि॒ब॒त॒म् । अ॒श्वि॒ना॒ ॥ ८.३५.१७

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:35» मन्त्र:17 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:16» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:17


शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे राजन् ! तथा हे मन्त्रिमण्डल ! आप दोनों मिलकर (क्षत्रम्) क्षत्रिय जाति अर्थात् बलिष्ठ दल को (जिन्वतम्) प्रसन्न रक्खा करें (उत) और उनकी प्रसन्नता के लिये (नॄन्) सर्व मनुष्यों को (जिन्वतम्) अपना प्रिय बनावें। शेष पूर्ववत् ॥१७॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

बल-उन्नतिपथ पर बढ़ना

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्राणापानो! आप (क्षत्रम्) = क्षतों से त्राण करनेवाले बल का हमारे में वर्धन करो। (उत) = और (नृन् जिन्वतम्) = उन्नतिपथ पर आगे बढ़नेवाले मनुष्यों का प्रीणन करो। अवशिष्ट मन्त्रभाग मन्त्र संख्या १६ पर व्याख्यात है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणसाधना द्वारा सोमरक्षण होकर हमारा बल बढ़ता है तथा हम उन्नतिपथ पर आगे बढ़ पाते हैं।

शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे राजानौ ! युवां क्षत्रं=क्षत्रियजातिं बलिष्ठदलं। जिन्वतं प्रसादयतम् उत तदर्थञ्च नॄन्=सर्वान् मनुष्यान्। जिन्वतं प्रसादयतम्। व्याख्यातमन्यत् ॥१७॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Animate, energise and develop the defence and administrative forces, sustain and inspire the people in general whosoever they are, destroy the evil and the violent, eliminate ill-health and disease and in unison with the sun and the dawn of every new day create new soma of joy and life’s excitement.