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आ त्वा॑ मद॒च्युता॒ हरी॑ श्ये॒नं प॒क्षेव॑ वक्षतः । दि॒वो अ॒मुष्य॒ शास॑तो॒ दिवं॑ य॒य दि॑वावसो ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā tvā madacyutā harī śyenam pakṣeva vakṣataḥ | divo amuṣya śāsato divaṁ yaya divāvaso ||

पद पाठ

आ । त्वा॒ । म॒द॒ऽच्युता॑ । हरी॒ इति॑ । श्ये॒नम् । प॒क्षाऽइ॑व । व॒क्ष॒तः॒ । दि॒वः । अ॒मुष्य॑ । शास॑तः । दिव॑म् । य॒य । दि॒वा॒व॒सो॒ इति॑ दिवाऽवसो ॥ ८.३४.९

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:34» मन्त्र:9 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:12» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:9


हरिशरण सिद्धान्तालंकार

श्येनं पक्षा इव

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे जीव ! (त्वा) = तुझे (मदच्युता) = अभिमान का सर्वथा त्याग करनेवाले (हरी) = इन्द्रियाश्व इस प्रकार (आवक्षतः) = लक्ष्य-स्थान पर ले जाते हैं, (इव) = जैसे (श्येनम्) = बाज को (पक्षा) = पङ्ख लक्ष्य पर पहुँचाते हैं। हम ज्ञानेन्द्रियों व कर्मेन्द्रियों को ठीक से व्यापृत करते हुए ही प्रभुरूप लक्ष्य को प्राप्त करते हैं। [११] हे ज्ञानधन ! तू उस शासक प्रकाशमय प्रभु के ज्ञानधन को प्राप्त कर ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हमारे इन्द्रियाश्व अभिमान से शून्य होते हुए स्वकार्य व्यापृति के द्वारा हमें प्रभु रूप लक्ष्य को प्राप्त करायें।

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - And may the mighty transportive powers stronger than all obstructive forces of pride and arrogance, transport you here to us like the powerful wings of the eagle flying the king of birds to his destination, and may you, from the light and power of this world of rule and order, O lover of light and peace, rise to the light and peace of heaven.